सिद्ध भगवान की आराधना से बढ़ता है पुण्य, आत्मा होती है विशुद्ध: आचार्य सुन्दर सागर

AYUSH ANTIMA
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निवाई (लालचंद माली): सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में आयोजित आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र मण्डल विधान के चौथे दिन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास का अनुपम संगम देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने भगवान का पंचामृत मस्तकाभिषेक कर पूजा-अर्चना की तथा इन्द्र-इन्द्राणियों ने भक्तिभाव से 64 अर्घ्य समर्पित किए। जैन समाज के मीडिया प्रभारी सुनील भाणजा एवं मंदिर अध्यक्ष सुशील जैन आरामशीन ने बताया कि आचार्य सुन्दर सागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में सौधर्म इन्द्र दिलीप जैन (रतलाम) परिवार एवं सभी इन्द्र-इन्द्राणियों ने श्रीजी का पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा कर विश्व शांति की मंगलकामना की। आचार्य सुन्दर सागर महाराज एवं आर्यिका सुलक्ष्मति माताजी के निर्देशन में श्रद्धालुओं ने नवदेवता पूजा, भगवान पार्श्वनाथ एवं भगवान शांतिनाथ की पूजा के साथ सिद्धचक्र मण्डल विधान की आराधना की तथा संगीतमय वातावरण में 64 श्रीफल मंडल पर अर्पित किए। विधान से पूर्व हुकुमचंद जैन, नेमिचंद सिरस, महेन्द्र चंवरिया, विष्णु बोहरा, सुरेश चंद भाणजा, पारस सिरस, महेश मोटूका, राजेंद्र बगड़ी एवं गोपाल कठमाणा ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। वहीं संजय जैन एंड पार्टी, भोपाल द्वारा प्रस्तुत भजनों पर श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर होकर नृत्य करते नजर आए।
चातुर्मास प्रवास के दौरान आचार्य सुन्दर सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि अच्छे समय पर कभी अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि समय बदलते देर नहीं लगती। उन्होंने कहा कि मन, वचन और कर्म को निर्मल बनाकर भगवान की भक्ति करने से जीवन के दुख दूर होते हैं और आत्मा की विशुद्धि होती है। उन्होंने कहा कि आठों कर्मों का नाश कर सिद्धत्व प्राप्त करने वाले सिद्ध भगवान की निष्ठापूर्वक पूजा-अर्चना करने से पुण्य की वृद्धि होती है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। जो श्रद्धालु सच्चे भाव से सिद्ध भगवान की आराधना करता है, वह श्रेष्ठ गति प्राप्त कर अंततः मोक्ष का अधिकारी बनता है। आचार्य ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि "श्वांस ही मंत्र है और मंत्र ही श्वांस है।" उन्होंने बताया कि "ऊँ ह्लीं असि आउसा नमः" मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप अशुभ कर्मों का क्षय करता है। उन्होंने सिद्धचक्र यंत्र की महिमा बताते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को पहले अपनी अंतरात्मा को शुद्ध करना चाहिए, क्योंकि मंत्र में ही अपार शक्ति निहित है। विधान के दौरान सौधर्म इन्द्र परिवार ने आचार्य निमंत्रण के साथ भगवान पार्श्वनाथ, भगवान शांतिनाथ एवं भगवान चंद्रप्रभु को गाजे-बाजे और भक्ति नृत्य के साथ सिंहासन पर विराजमान कराया। कार्यक्रम का समापन भव्य महाआरती के साथ हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया।

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