दादू राजा राणा राव मैं, मैं खानौ सिर खान। माया मोह पसारै एता, सब धरती आसमान।। इस साखी वचन में ब्रह्मऋषि श्रीदादू जी महाराज, जीव के अहंकार को बतला रहे हैं। जीव सोचता है कि मैं राजा हूं, राजा ही नहीं राजाओं के जो राजा है, उनका भी मैं राजा हूं। अधिक क्या कहें, सभी महापुरुषों का भी मैं शिरोमणि हूं और जीव माया मोहित होकर स्वर्ग पाताल आदि राज्य को प्राप्त करने की अभिलाषा करता है परंतु यह विचार नहीं करता कि मैं तो काल का ग्रास हूं। यह जीव के अज्ञान की पराकाष्ठा है, जो भजन के लिए मिला था, उसे भजन ना करके अहंकार को करता है।
लिखा है कि यह शरीर पंचभूतों से बना होने से मृत्यमय और क्षण-भंगुर है। इस मिथ्या शरीर के लिए जीव कितना अभिमान करता है और यह नहीं समझता की मिट्टी मांस का शरीर क्षण भर में ही नष्ट हो जाएगा। महात्मा कविवर श्री सुंदर दास जी महाराज ने कहा है कि जैसे बगुला मछली को अविलम्ब क्षण चोंच में झपट लेता है, मकड़ी किसी कीट को पकडने के लिये जाल फैलाये रहती है। उसी प्रकार काल भी क्षणभर में आकर तुझे वश में कर लेगा, इसलिये अज्ञानी जीव तू सब छोड़कर हरिस्मरण में तत्पर हो जा।