नाथद्वारा मंदिर चोरी प्रकरण बनाम राम मंदिर चोरी प्रकरण

AYUSH ANTIMA
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1958 में राजस्थान के नाथद्वारा स्थित श्रीनाथ जी मंदिर में गहनों और संपति की घटना पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे सीधा डकैती करार दिया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि जनता की आस्था और चढ़ावे का इस तरह निजी लालच के लिए इस्तेमाल किया, वो पूरी तरह अनुचित है। नेहरु ने राजस्थान के तत्वावधान मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाडिया और केन्द्रीय गृह मंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त को पत्र लिखकर इस मामले में कठोर कार्यवाही के आदेश दिये थे। अपने पत्र में नेहरू ने कहा था कि महाराज द्वारा मंदिर की संपति को चुपचाप ले जाना सार्वजनिक धन का दुरूपयोग है। उन्होंने लिखा कि गबन इसलिए संभव हो सका कि मामले को संभालने मे ढिलाई बरती गई। गठित जांच समिति महाराज की आपत्तियों के कारण कभी काम ही नहीं कर सकी। नेहरू ने आगे लिखा कि इस तरह की घटनाओं को होने देना हमारी सरकारो के लिए सम्मान की बात नहीं है। उन्होंने नाथद्वारा मंदिर प्रकरण को लेकर लिखा कि कोई भी धार्मिक व्यक्ति ऐसी व्यवस्था को कैसे सहन कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि महंत हो या महाराज धर्म, अध्यात्म और ईमानदार जीवन व्यवहार से जितनी दूर हो सकते हैं, उतनी दूर है। उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए लिखा कि व्यक्तियों के लालच और लोभ के लिए जन भावनाओं का शोषण करना अनुचित है। लगता है कि नाथद्वारा की आय का उपयोग केवल राजनीतिक उद्देश्य के लिए हो रहा है, सामाजिक व आर्थिक सरोकारों से कोई लेना देना नहीं है। जिस नेहरू को एक खास समुदाय का संरक्षक होने की बात की जाती है, उनको नाथद्वारा प्रकरण से सीख लेनी चाहिए। विदित हो राम सदैव ही भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीतिक मुद्दा रहा है, जो मंदिर निर्माण के बाद भी अनवरत जारी है। नेहरू जिसको लेकर तुष्टिकरण की राजनीति करने को लेकर कहते रहे हैं, उन्होंने जिस तरह से धार्मिक स्थल नाथद्वारा में चोरी प्रकरण को लेकर पत्र द्वारा कठोर कार्यवाही के निर्देश दिए थे। इसके विपरीत केन्द्र मे सनातन धर्म की रक्षक सरकार सत्ता में है लेकिन आधिकारिक तौर पर राम मंदिर चोरी प्रकरण को लेकर सरकार का या प्रधानमंत्री का कोई बयान नहीं आया है। इसके विपरीत पिछले एक महीने से इस पर मिडिया ट्रायल हो रहा है और भाजपा के प्रवक्ता यह कहते नजर आते हैं कि जिन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाई, उनको इस चोरी प्रकरण पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि जिस मुख्य सचिव के कार्यकाल में राम सेवकों पर गोली चलाई गई थी, वह अधिकारी ट्रस्ट में शामिल हैं और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को क्या पद्मभूषण सम्मान कारसेवकों पर गोली चलाने के लिए ही मोदी सरकार ने दिया था। उन भाजपा प्रवक्ताओं के अनुसार वहीं रामभक्त है, जिन्होंने अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन किए हैं और इस प्रकरण पर उन्हीं को बोलने का अधिकार है। विदित हो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भव्य मन्दिर बन जाने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के साथ रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की थी, जब पूरे देश में इस प्रकरण को लेकर उबाल आया हुआ है तो क्या उनको नाथद्वारा प्रकरण में जिस तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चुप्पी तोडी, उसी तरह चुप्पी आखिर क्यों नहीं तोड़ रहे। नाथद्वारा चोरी प्रकरण भी सनातनियों की आस्था पर प्रहार था व राम मंदिर प्रकरण भी उसी आस्था को ठेस पहुंचाने वाला प्रकरण है। क्या नेहरु व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दोनों का धार्मिक आस्था को देखने का नजरिया अलग अलग है। हालांकि उतर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आस्था पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं उठाया जा सकता है और उन्होंने जांच कमेटी का तुरंत गठन किया व अपराधी जेल में हैं और योगी बार बार यह कह रहे हैं कि किसी को भी बक्शा नहीं जायेगा लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी को लेकर प्रश्न उठने लाजिमी है ।

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