राजनीति में भाषा का बदलता स्तर

AYUSH ANTIMA
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लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति केवल मतदान नहीं, बल्कि स्वस्थ संवाद है। राजनीति में विचारों का टकराव स्वाभाविक है, किंतु शब्दों का टकराव कभी भी लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता। सार्वजनिक जीवन में भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह व्यक्ति के संस्कार, उसकी सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी परिचय देती है। इसलिए राजनीति में भाषा का स्तर जितना ऊँचा होगा, लोकतंत्र उतना ही परिपक्व और समाज उतना ही स्वस्थ दिखाई देगा। भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब वैचारिक मतभेद होने के बावजूद नेताओं ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव बनाए रखा। संसद हो या जनसभा, बहसें तीखी होती थीं, लेकिन भाषा की मर्यादा शायद ही कभी टूटती थी। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी चुनावी मैदान में एक-दूसरे के विरोधी अवश्य होते थे, पर व्यक्तिगत कटुता उनके व्यवहार पर हावी नहीं होती थी। यही लोकतांत्रिक संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान थी। समय के साथ राजनीति का स्वरूप बदला है। चुनावी प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक तीखी हुई है, सोशल मीडिया ने राजनीतिक संवाद की गति बढ़ा दी है और चौबीस घंटे चलने वाले समाचार माध्यमों ने हर बयान को तुरंत जन-जन तक पहुँचा दिया है। ऐसे माहौल में कई बार विचारों की जगह शब्दों की तल्ख़ी अधिक दिखाई देती है। व्यक्तिगत टिप्पणियाँ, कटाक्ष, व्यंग्य और मर्यादा की सीमा को छूते या लाँघते वक्तव्य लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करते हैं। यह प्रवृत्ति किसी एक दल या विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक जीवन के लिए समग्र रूप से चिंता का विषय है। लोकतंत्र में मतभेद होना आवश्यक है, क्योंकि विचारों की विविधता ही उसकी शक्ति है। किंतु मतभेद यदि मनभेद में बदल जाएँ और असहमति अपमान का रूप ले ले, तो लोकतांत्रिक संवाद की गरिमा प्रभावित होती है। शब्दों की मर्यादा टूटने पर बहस का स्तर गिरता है और तर्क की जगह आरोप-प्रत्यारोप हावी होने लगते हैं। इससे न केवल राजनीतिक वातावरण प्रभावित होता है, बल्कि समाज में भी वैसी ही भाषा और व्यवहार को बढ़ावा मिलता है। सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों की जिम्मेदारी सामान्य नागरिक से कहीं अधिक होती है। उनके भाषण, वक्तव्य और व्यवहार को लाखों लोग सुनते और देखते हैं। विशेष रूप से युवा पीढ़ी अनेक बार अपने पसंदीदा नेताओं की भाषा और शैली का अनुकरण करती है। यदि सार्वजनिक मंचों से संयमित और सम्मानजनक भाषा का प्रयोग होगा, तो समाज में संवाद की संस्कृति मजबूत होगी। इसके विपरीत यदि कटुता, व्यंग्य और व्यक्तिगत आक्षेप सामान्य बन जाएँ, तो उसका प्रतिकूल प्रभाव सामाजिक वातावरण पर भी पड़ना स्वाभाविक है। राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज का नेतृत्व करना भी है। नेतृत्व का अर्थ केवल निर्णय लेना नहीं, बल्कि अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना भी है। शब्दों की मर्यादा किसी कानून के भय से नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और लोकतांत्रिक संस्कारों से बनी रहती है। विरोध कीजिए, पर विरोधी का सम्मान बनाए रखिए, विचारों का प्रतिवाद कीजिए, व्यक्ति का नहीं। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। यह भी सत्य है कि भाषा का स्तर केवल नेताओं की जिम्मेदारी नहीं है। समाज, मीडिया और नागरिकों की भी भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि हम मर्यादित संवाद को प्रोत्साहित करेंगे और कटु भाषा को ताली नहीं, बल्कि अस्वीकार करेंगे, तभी सार्वजनिक जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव होगा। लोकतंत्र केवल संसद या विधानसभाओं में नहीं, बल्कि समाज के व्यवहार में भी जीवित रहता है। आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि राजनीति में मतभेद समाप्त हो जाएँ, आवश्यकता इस बात की है कि मतभेदों की अभिव्यक्ति शालीन और तर्कपूर्ण भाषा में हो। शब्दों की गरिमा ही लोकतंत्र की गरिमा है। इतिहास गवाह है कि कटु शब्द क्षणिक तालियाँ तो बटोर सकते हैं, लेकिन सम्मान नहीं। अंततः वही नेता और वही राजनीति समाज के हृदय में स्थान बनाती है, जिसके शब्दों में संयम हो, विचारों में गंभीरता हो और व्यवहार में मर्यादा हो। लोकतंत्र की असली जीत चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि संवाद की गरिमा बनाए रखने में है।

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