मनुष्य को प्रकृति ने अनेक वरदान दिए हैं, पर उनमें सबसे अनमोल है—वाणी। शब्द केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं होते, वे रिश्तों की नींव भी रखते हैं। इन्हीं से विश्वास जन्म लेता है और मनुष्य एक दूसरे से जुड़ता है किंतु जीवन का अनुभव यह भी सिखाता है कि हर स्थान पर शब्दों का सम्मान नहीं होता। जहाँ सुनने की इच्छा समाप्त हो जाए और पूर्वाग्रह निर्णय लेने लगें, वहाँ शब्द अपना मूल्य खो देते हैं। ऐसे समय में मौन ही सबसे विवेकपूर्ण उत्तर बन जाता है।आज संवाद का उद्देश्य एक-दूसरे को समझना कम और स्वयं को सही सिद्ध करना अधिक हो गया है। मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन जब उनमें अहंकार, स्वार्थ, ईर्ष्या और लालच का समावेश हो जाता है, तब संवाद की गरिमा नष्ट होने लगती है। ऐसे वातावरण में सत्य भी तर्क से नहीं, बल्कि शोर से पराजित दिखाई देता है। यदि सामने वाला मन ही मन यह निश्चय कर चुका हो कि उसे आपकी बात स्वीकार नहीं करनी, तो बार-बार अपनी सफाई देना केवल अपनी गरिमा को आहत करना है। जहाँ शब्दों का कोई मोल न हो, वहाँ मौन ही अधिक सार्थक होता है। विडंबना यह है कि अनेक लोग अपनी सच्चाई सिद्ध करने के प्रयास में वर्षों तक मानसिक अशांति का बोझ ढोते रहते हैं। पारिवारिक हो या सामाजिक विवाद, कई बार समाधान खोजने वालों से अधिक तमाशा देखने वाले मिल जाते हैं। ऐसे अवसरों पर हर प्रतिक्रिया विवाद को और गहरा करती है। तब समझ में आता है कि हर युद्ध जीतना आवश्यक नहीं होता, कुछ संघर्षों से गरिमापूर्वक स्वयं को अलग कर लेना ही सबसे बड़ी विजय है। मौन कभी कायरता का प्रतीक नहीं रहा। यह आत्मसंयम, धैर्य और परिपक्वता का परिचायक है। जो व्यक्ति हर कटु शब्द का उत्तर देने से स्वयं को रोक लेता है, वही अपने व्यक्तित्व की ऊँचाई सिद्ध करता है। प्रतिक्रिया देना सहज है, किंतु संयम बनाए रखना साधना है। मौन सामने वाले को नहीं, सबसे पहले स्वयं को बचाता है। यह मन की ऊर्जा को व्यर्थ होने से रोकता है और आत्मसम्मान की रक्षा करता है। जीवन की वास्तविक सफलता दूसरों को परास्त करने में नहीं, बल्कि अपने भीतर शांति बनाए रखने में है। प्रत्येक आरोप का प्रतिवाद आवश्यक नहीं होता और प्रत्येक गलतफहमी का समाधान शब्दों से संभव भी नहीं होता। सत्य को शोर का सहारा नहीं चाहिए, समय उसका सबसे विश्वसनीय साक्षी है। समय के न्यायालय में वही टिकता है, जिसकी नींव सत्य पर टिकी हो। इसलिए जहाँ आपके विचारों का सम्मान हो, वहाँ पूरे मन से संवाद कीजिए। जहाँ विश्वास, संवेदना और सद्भाव जीवित हों, वहाँ शब्दों को खुलकर बहने दीजिए। किंतु जहाँ आपकी बात का कोई मूल्य न हो, जहाँ पूर्वाग्रह विवेक पर भारी पड़ चुके हों, वहाँ मौन धारण करना पराजय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का उत्सव है। स्मरण रहे, शब्दों की भी एक मर्यादा होती है। जब वे बेमोल हो जाएँ, तब मौन ही मनुष्य के व्यक्तित्व का सबसे प्रभावशाली, सबसे गरिमामय और सबसे अनमोल वक्तव्य बन जाता है इसलिए जब बात हो बेमोल तो रहें मौन।
3/related/default