आप निरंजन यौ कहै, कीरति करतार। मैं जन सेवग द्वै नहीं, एकै अंग सार।। मम कारीण सब परहरै, आपा अभिमान। सदा अखंडित उर धरै, बोलै भगवान॥ अन्तर पट जीवै नहीं, तब ही मर जाइ। बिछुरे तलफै मीन ज्यों, जीवै जल आइ॥ खीर नीर ज्यों मिल रहै, जल जलहि समान। आतम पाणी लौंण ज्यों, दूजा नाहीं आन॥ मैं जन सेवग द्वै नहीं, मेरा विश्राम। मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहैं राम॥ अर्थात भक्त और भगवान् में जरा भी भेद नहीं होता, अपितु दोनों समान ही होते हैं। उत्पत्ति, स्थिति, पालनरूप कर्म को छोड़कर भक्त में भगवान् का ऐश्वर्य भक्ति बल से तथा भगवत्कृपा से आ जाता है। जैसे ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्मरूप हो जाता है। वैसे ही भक्त भी भक्ति के कारण अज्ञान का नाश होने से भगवद् रूप हो जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कि हे अर्जुन ! उन भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये उनके अन्त:करण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञान के द्वारा नष्ट कर देता हूँ। भगवान् के स्वरूप को जानकर फिर दुःखालय संसार में नहीं लौटते। मेरे को प्राप्त करने के बाद महात्मा भक्त इस संसार में नहीं आते, क्योंकि उनके रजोगुण और तमोगुण उनके अन्त:करण से निकल जाते है, केवल शुद्ध सात्विक गुण वाले होने से उनको आत्मज्ञान हो जाता है। अहंकार आदि सबको त्यागकर अनन्य चित्त से मेरा ही ध्यान करते हैं और मुख से मेरा नामोच्चारण करते रहते हैं। यदि किसी कारण से उनके और मेरे बीच में अन्तराल आता है तो वे मछली की तरह जीवन को ही त्याग देते हैं। जैसे जल में जल, दूध में दूध और जल में नमक की तरह परमात्मा में मिलकर तद्रूप हो जाते हैं। उनको मेरे सिवा और कुछ अच्छा ही नहीं लगता। उनके हृदय में कभी द्वैत-बुद्धि पैदा ही नहीं होती। उनके मन और बुद्धि मेरे में ही लगे रहते हैं। वे मेरे में ही निवास करते हैं। इस तरह भगवान् ही कहते हैं कि मैं और मेरा भक्त अलग-अलग नहीं हैं। दुर्वासा जी ! मैं आप से और क्या कहूं। मेरे प्रेमी भक्त तो मेरे हृदय हैं और उन प्रेमी भक्तों का हृदय मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते और मैं भी उनके अतिरिक्त कुछ भी नहीं जानता।भक्तामरस्रोत्र में-हे जगत के भूषण ! हे प्राणियों के स्वामिन् भगवान् ! आपके सत्य और महान् गुणों की स्तुति करने वाले मनुष्य आपके ही समान हो जाते हैं परन्तु इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है क्योंकि जो कोई स्वामी अपने आश्रित पुरुष को विभूति के द्वारा अपने समान नहीं बना लेता तो उसके स्वामीपन से क्या लाभ है।
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