मनुष्य को अच्छे कर्म करने के लिए किसी विशेष दिन की आवश्यकता नहीं होती। प्यासे को जल देना, भूखे को भोजन कराना, असहाय की सहायता करना, पशु-पक्षियों के लिए अन्न-जल रखना, माता-पिता की सेवा करना और किसी दुखी व्यक्ति को सहारा देना—ये सभी कर्म किसी भी दिन किए जाएं, पुण्यकारी माने जाते हैं। फिर भी हमारी धार्मिक परंपराओं में एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रांति, प्रदोष, ग्रहण और पर्वों पर दान, जप, तप तथा सेवा का विशेष महत्व बताया गया है। यहां स्वाभाविक रूप से यह विचार उठता है कि जब अच्छा कर्म हर दिन पुण्य देता है, तो विशेष तिथि पर उसी कर्म का महत्व अधिक क्यों माना जाता है। इसका उत्तर केवल तिथि में नहीं, बल्कि समय, संकल्प, मन और साधना के मेल में छिपा है।
मनुष्य प्रतिदिन अनेक कार्य करता है। अधिकांश काम आदत, आवश्यकता या परिस्थिति के अनुसार होते हैं लेकिन जब कोई विशेष तिथि आती है, तो व्यक्ति उस दिन किसी कार्य को विशेष भाव, श्रद्धा और संकल्प के साथ करता है। यही संकल्प सामान्य कर्म को साधना की दिशा देता है। उदाहरण के लिए, किसी प्यासे को प्रतिदिन पानी पिलाना सेवा है लेकिन एकादशी के दिन भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए जलदान किया जाए, तो उस कर्म के साथ भक्ति और संकल्प भी जुड़ जाते हैं। इसी प्रकार अमावस्या पर पितरों की स्मृति में भोजन या वस्त्र दान किया जाए, तो उस कर्म के साथ कृतज्ञता का भाव जुड़ता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि साधारण दिन किया गया अच्छा कर्म कम महत्व रखता है बल्कि विशेष तिथि उस कर्म को एक अतिरिक्त आध्यात्मिक संदर्भ देती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के जीवन को केवल कैलेंडर से नहीं, बल्कि प्रकृति, सूर्य, चंद्रमा और समय-चक्र से जोड़कर देखा। तिथि सूर्य और चंद्रमा की पारस्परिक स्थिति से बनती है। ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। इसी कारण अलग-अलग तिथियों को अलग मानसिक और आध्यात्मिक प्रवृत्तियों से जोड़ा गया। एकादशी को संयम, पूर्णिमा को पूर्णता, अमावस्या को आत्मचिंतन और पितृ स्मरण, संक्रांति को परिवर्तन तथा प्रदोष को शिव उपासना से जोड़ा गया। इससे मनुष्य को समय-समय पर अपने जीवन की दिशा देखने का अवसर मिलता है। विशेष तिथि का महत्व एक और कारण से भी है। मनुष्य अच्छे कार्यों को टालता रहता है। वह सोचता है कि किसी दिन दान करेंगे, कभी सेवा करेंगे, समय मिलने पर पूजा करेंगे। यदि कोई निश्चित तिथि न हो, तो कई अच्छे संकल्प केवल विचार बनकर रह जाते हैं। धार्मिक तिथियां मनुष्य को स्मरण कराती हैं कि अब रुककर कुछ अच्छा करना है।
* एकादशी कहती है—इंद्रियों को संयमित करो।
* अमावस्या कहती है—अपने पूर्वजों को याद करो।
* पूर्णिमा कहती है—मन को शुद्ध और शांत करो।
* संक्रांति कहती है—परिवर्तन के साथ दान और सेवा को जीवन में स्थान दो।
इस प्रकार विशेष तिथियां केवल पुण्य कमाने का अवसर नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासित करने की व्यवस्था भी हैं।
यहां एक बात और समझना आवश्यक है। पुण्य केवल दान की मात्रा से तय नहीं होता।
किसी धनी व्यक्ति के लिए हजार रुपये देना सरल हो सकता है, जबकि किसी गरीब व्यक्ति के लिए एक रोटी बांटना बड़ा त्याग हो सकता है। इसलिए कर्म के साथ भावना, सामर्थ्य और त्याग भी महत्वपूर्ण हैं। इसी प्रकार केवल विशेष तिथि पर बड़ा दान कर देना और पूरे वर्ष अन्याय, छल या कठोरता से जीवन जीना धर्म की पूर्णता नहीं है। सच्चा धर्म निरंतरता मांगता है। विशेष तिथि अच्छे कर्म का विकल्प नहीं है, बल्कि अच्छे कर्म की चेतना को और गहरा करने का अवसर है। जो व्यक्ति प्रतिदिन सेवा करता है, वह धर्म को जीवन में उतारता है। जो व्यक्ति विशेष तिथि पर संकल्पपूर्वक दान करता है, वह समय की आध्यात्मिकता को अपने कर्म से जोड़ता है। दोनों का महत्व है। एक में निरंतरता है, दूसरे में संकल्प की तीव्रता। श्रेष्ठ स्थिति वह है, जहां मनुष्य रोज अच्छे कर्म करे और विशेष तिथि पर उन्हें अधिक श्रद्धा, अनुशासन और जागरूकता के साथ निभाए। तिथि स्वयं पुण्य पैदा नहीं करती। वह मनुष्य को पुण्य कर्म के प्रति अधिक जागरूक बनाती है। कर्म बीज है, भावना उसकी भूमि है और विशेष तिथि अनुकूल ऋतु की तरह है।
बीज अच्छा हो, भूमि उपजाऊ हो और समय अनुकूल हो, तो उसका परिणाम अधिक सुंदर हो सकता है। इसी प्रकार अच्छे कर्म हर दिन फल देते हैं, लेकिन विशेष तिथि पर श्रद्धा, संकल्प, भक्ति और सामूहिक चेतना के जुड़ने से वही कर्म अधिक गहराई प्राप्त कर सकता है।
इसलिए धर्म का सही मार्ग यह नहीं कि केवल विशेष दिनों में अच्छे कार्य किए जाएं। सही मार्ग यह है कि सद्कर्म जीवन की आदत बनें और विशेष तिथियां उस आदत को और मजबूत करने का अवसर बनें।
अच्छा कर्म हर दिन पुण्य है, लेकिन विशेष तिथि उस पुण्य को संकल्प, साधना और जागरूकता से जो