निवाई (लालचंद माली): क्षेत्र के अनेक निजी शैक्षणिक संस्थानों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी अब गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। आरोप है कि कई स्कूल और कॉलेज बिना वैध फायर एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) के संचालित हो रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग कार्रवाई करने के बजाय मौन साधे हुए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है। विद्यार्थियों के अभिभावकों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि जिन संस्थानों में प्रतिदिन सैकड़ों-हजारों बच्चे पढ़ने आते हैं, वहां आग से बचाव के पर्याप्त इंतजाम तक नहीं हैं। इसके बावजूद इन संस्थानों का संचालन निर्बाध जारी है। इससे यह आशंका गहराती जा रही है कि कहीं नियम-कानून सिर्फ कागजों तक ही सीमित तो नहीं रह गए हैं। दिल्ली, जयपुर और देश के अन्य शहरों में आगजनी की कई दर्दनाक घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें मासूम बच्चों और आम लोगों की जान गई। इन हादसों ने सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि स्थानीय स्तर पर इन घटनाओं से भी कोई सबक नहीं लिया गया। सबसे बड़ा सवाल शिक्षा विभाग पर भी खड़ा हो रहा है। यदि फायर एनओसी अनिवार्य है तो बिना इसके इन संस्थानों को मान्यता कैसे दी गई। भवनों का निरीक्षण और सुरक्षा ऑडिट करते समय क्या अधिकारियों को फायर सुरक्षा उपकरणों की कमी दिखाई नहीं दी। यदि दिखाई दी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई, और यदि नहीं दिखाई दी तो निरीक्षण की प्रक्रिया पर ही सवाल उठना स्वाभाविक है।
फायर विभाग द्वारा कई संस्थानों को नोटिस जारी किए जाने की भी चर्चा है, लेकिन आरोप है कि इन नोटिसों को भी कई संचालकों ने गंभीरता से नहीं लिया। यदि नोटिस के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती, तो ऐसे नोटिसों का औचित्य क्या रह जाता है? क्या नियमों की अवहेलना करने वालों को खुली छूट दे दी गई है। जनता पूछ रही है कि यदि किसी स्कूल या कॉलेज में आग लगने जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना हो जाती है और विद्यार्थियों की जान जोखिम में पड़ती है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। क्या संस्थान संचालक, शिक्षा विभाग या फायर विभाग या फिर हर बार की तरह हादसे के बाद जांच समिति बनाकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया जाएगा।
क्षेत्र के लोगों ने मांग की है कि बिना फायर एनओसी संचालित सभी शैक्षणिक संस्थानों की तत्काल संयुक्त जांच कराई जाए, सुरक्षा मानकों की समीक्षा की जाए और नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों की मान्यता निलंबित अथवा रद्द करने जैसी कठोर कार्रवाई की जाए। साथ ही संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या प्रशासन समय रहते जागेगा या फिर किसी बड़े हादसे के बाद केवल शोक संदेश और जांच के आदेश ही जारी होंगे।