प्रजातांत्रिक व्यवस्था में विकास के मायने

AYUSH ANTIMA
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प्रजातांत्रिक व्यवस्था में विकास का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं है बल्कि यह एक बहुआयामी प्रकिया है। इसका मुख्य लक्ष्य सभी नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार, सामाजिक न्याय, समान अधिकार और मानव कल्याण सुनिश्चित करना है ताकि विकास का लाभ हर वर्ग तक पहुंच सके। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा में सुधार भी शामिल है। प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली में जनता की सक्रिय भागीदारी होती है और सरकार अपने निर्णयों व नितियों के लिए जनता के प्रति पूर्णतः उत्तरदायी है। आर्थिक समृद्धि और समानता को लेकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि आर्थिक विकास के लाभों का समान वितरण हो, जिससे असमानता कम हो और ग़रीबी का उन्मूलन हो। अखबारों में विज्ञापन या बड़े बड़े होर्डिंग के जरिये विकास कार्यों को महिमा मंडित करना विकास की श्रेणी में नहीं आता है, जैसा कि वर्तमान में देखा जा रहा है। वास्तविक विकास जमीन पर दिखने वाले परिणामों जैसे अच्छी सड़कें, रोजगार के अवसर, पीने का पानी, बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओ मे होता है। विज्ञापन द्वारा केवल छवि सुधारी जा सकती है। विकास वह है, जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाए और लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाए। विज्ञापन पर होने वाले भारी भरकम खर्च को यदि विकास में जोड़ें तो वास्तविक विकास तब होता है जब धन सीधे बुनियादी ढांचे के निर्माण पर खर्च हो। यह देखा गया है कि सरकारें केवल अपनी सकारात्मक छवि बनाने के लिए विज्ञापनों पर भारी खर्च करती है। यदि जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ है तो यह विज्ञापन केवल प्रचार के माध्यम है। मार्केटिंग का एक नया फंडा भी देखने को मिला कि देश का मुखिया बड़े लाव लश्कर और तामझाम के साथ युवाओं को नोकरी के नियुक्ति पत्र बांट रहे हैं। विकास के बड़े बड़े दावे की पोल सरकारी आंकड़े ही दे रहे हैं कि इस देश में आधे से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है क्योंकि सरकार दावा कर रही है कि 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन वितरित किया जा रहा है। देश का यह कैसा विकास और कैसा विश्व गुरु जब अस्सी करोड़ लोग पांच किलो राशन पर निर्भर हो। क्या अस्सी करोड़ लोग, जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं, हम विश्व शक्ति या विश्व गुरू बनने की बात कह सकते हैं। ज्यों ही किसी सरकारी योजना की घोषणा होती है, सोशल मिडिया पर बाढ़ आ जाती है कि मुख्यमंत्री विकास पुरूष बनकर आये है। राजस्थान की बात करें तो विकास तो अफसरशाही ने किया है, जो बेधड़क अकूत संपति के मालिक बन बैठे और हर रोज किसी न किसी अफसर के ट्रेप होने के समाचार सुर्खियां बटोर रहे हैं। कानून व्यवस्था का जीता जागता उदाहरण हमें श्रीगंगानगर व सीकर के एक गांव में देखने को मिला है कि किस तरह बैखोफ होकर अपराधी अपराध कर रहे हैं और भूमाफिया मंदिर माफी की जमीन हड़पने के लिए अनैतिक हथकंडे अपना रहे हैं। एक मारवाड़ी कहावत है कि घी तो बाड़ में गैरयोडो ही दिखै तो सरकारों को सोचना होगा कि कागजों मे विकास की गंगा बहाने से बाज आए।

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