भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ, जप और ध्यान का विशेष महत्व है। पूजा केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि मन को शांत करने, विचारों को शुद्ध करने और जीवन में अनुशासन लाने का माध्यम भी है। पूजा की सामग्री में दीपक, धूप, पुष्प, जल और मंत्रों के साथ आसन का भी महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है।
पूजा, जप या ध्यान के समय जिस वस्तु पर साधक बैठता है, उसे आसन कहा जाता है। आसन केवल बैठने के लिए बिछाया गया कपड़ा नहीं है, बल्कि यह साधक को स्थिरता, सुविधा और एकाग्रता प्रदान करता है। नियमित रूप से एक ही आसन पर बैठकर पूजा करने से मन धीरे-धीरे उस स्थान और समय के साथ जुड़ने लगता है। इससे व्यक्ति का ध्यान शीघ्र पूजा और भक्ति में लग जाता है।
*पूजा में आसन क्यों आवश्यक है*
परंपरागत मान्यता के अनुसार सीधे जमीन पर बैठकर पूजा, मंत्र-जप या ध्यान नहीं करना चाहिए। माना जाता है कि साधना के समय उत्पन्न होने वाली ऊर्जा भूमि में प्रवाहित हो सकती है। आसन साधक और भूमि के बीच एक माध्यम का कार्य करता है। व्यावहारिक दृष्टि से भी आसन उपयोगी है। यह शरीर को ठंडी, गर्म, कठोर या नम भूमि से बचाता है। आसन पर बैठने से व्यक्ति अधिक समय तक स्थिर रह सकता है। शरीर स्थिर रहने से श्वास सामान्य रहती है और मन बार-बार भटकने से बचता है।
यदि विशेष पूजा-आसन उपलब्ध न हो, तो स्वच्छ कपड़ा, दरी या चटाई बिछाकर भी पूजा की जा सकती है। सबसे आवश्यक बात यह है कि बैठने का स्थान साफ, सुविधाजनक और पवित्र हो।
*पूजा के लिए कौन-सा आसन उचित है*
पूजा और साधना के लिए कुशासन, ऊनी आसन, सूती आसन या स्वच्छ चटाई का प्रयोग किया जा सकता है। कुशासन को मंत्र-जप, ध्यान और वैदिक अनुष्ठानों में विशेष महत्त्व दिया जाता है। ऊनी आसन शरीर की ऊष्मा को बनाए रखने और लंबे समय तक बैठने में सहायक होता है। सामान्य घरेलू पूजा के लिए सूती आसन सरल और उपयोगी माना जाता है। लकड़ी के पाटे पर बैठना हो, तो उस पर स्वच्छ कपड़ा या आसन अवश्य बिछाना चाहिए। केवल नंगी लकड़ी या सीधे जमीन पर बैठने से बचना चाहिए।
*आसन का शुद्धिकरण और देखभाल*
पूजा का आसन सदैव स्वच्छ रखना चाहिए। पहली बार उसका प्रयोग करने से पूर्व उस पर गंगाजल या स्वच्छ जल का हल्का छिड़काव किया जा सकता है। इसके बाद भगवान, इष्टदेव और गुरु का स्मरण करके आसन ग्रहण करना चाहिए। पूजा समाप्त होने के बाद आसन को पैरों से हटाने के स्थान पर हाथ से उठाकर सम्मानपूर्वक मोड़ना चाहिए। उसे किसी साफ और निश्चित स्थान पर रखें। पूजा का आसन जूते-चप्पल, गंदे वस्त्र और अशुद्ध वस्तुओं के संपर्क में नहीं आना चाहिए। आसन का प्रयोग भोजन करने, सोने, पैर रखने या सामान्य घरेलू कार्यों के लिए भी नहीं करना चाहिए। बच्चों को भी समझाना चाहिए कि पूजा का आसन खेलने या उस पर जूते पहनकर चढ़ने की वस्तु नहीं है।
*क्या प्रत्येक व्यक्ति का आसन अलग होना चाहिए*
नियमित पूजा, मंत्र-जप, ध्यान और साधना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का अपना अलग आसन होना श्रेष्ठ माना जाता है। जब कोई साधक प्रतिदिन एक ही आसन पर बैठता है, तो उसके मन में उस आसन के प्रति श्रद्धा और साधना का भाव विकसित हो जाता है। व्यक्तिगत आसन रखने से स्वच्छता भी बनी रहती है। विशेष रूप से दीक्षा-मंत्र, अनुष्ठान या नियमित जप करने वाले व्यक्ति को अपना आसन दूसरों को उपयोग के लिए नहीं देना चाहिए। हालाँकि घर में प्रत्येक सदस्य के लिए अलग आसन रखना संभव न हो, तो एक बड़ी स्वच्छ दरी बिछाई जा सकती है। उस पर प्रत्येक व्यक्ति के नीचे अलग छोटा कपड़ा रखा जा सकता है। सामूहिक भजन, कथा, हवन या पारिवारिक पूजा में सभी लोग एक ही साफ दरी पर बैठ सकते हैं। इसमें कोई दोष नहीं माना जाता।
*आसन फट जाए तो क्या करें*
नियमित उपयोग के कारण पूजा का आसन समय के साथ पुराना, पतला या फटा हुआ हो सकता है। यदि आसन केवल किनारे से थोड़ा फटा है और अभी बैठने योग्य है, तो उसे साफ करके अच्छी तरह सिलवाया जा सकता है। मरम्मत के बाद सामान्य पूजा में उसका प्रयोग किया जा सकता है लेकिन यदि आसन बहुत अधिक फट गया हो, उसके धागे निकल रहे हों, उसमें छेद हो गए हों या उस पर स्थिर बैठना कठिन हो, तो उसे पूजा में उपयोग करना बंद कर देना चाहिए। फटे आसन को लेकर भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। आसन बदलने का मुख्य उद्देश्य पूजा की स्वच्छता, सुविधा और मर्यादा बनाए रखना है। विशेष मंत्र-जप, दीक्षा-साधना, हवन या अनुष्ठान के लिए नया और स्वच्छ आसन ग्रहण करना अधिक उचित माना जाता है।
*पुराने फटे आसन का क्या करें*
पूजा में उपयोग किए गए पुराने आसन को सामान्य कचरे की तरह इधर-उधर नहीं फेंकना चाहिए। यदि वह किसी स्वच्छ कार्य में प्रयोग योग्य है, तो उससे पूजा की अलमारी साफ की जा सकती है या धार्मिक पुस्तकों को ढका जा सकता है।
उसे पैर पोंछने, जूते रखने या गंदे कार्यों में उपयोग नहीं करना चाहिए। यदि आसन पूरी तरह अनुपयोगी हो गया है, तो उसे स्वच्छ कपड़े या कागज में लपेटकर स्थानीय कचरा-व्यवस्था के अनुसार सम्मानपूर्वक निस्तारित करें।
सिंथेटिक, प्लास्टिक या रबर से बने आसन को जलाना उचित नहीं है, क्योंकि उससे हानिकारक धुआँ उत्पन्न हो सकता है। पुराने आसन को नदी, तालाब या किसी जलस्रोत में प्रवाहित करना भी पर्यावरण की दृष्टि से उचित नहीं है।
*नया आसन कैसे ग्रहण करे*
नया आसन घर लाने के बाद उसे स्वच्छ स्थान पर रखें। पहली बार प्रयोग करने से पूर्व उस पर गंगाजल या साफ जल का छिड़काव करें। अपने इष्टदेव और गुरु का स्मरण करके श्रद्धापूर्वक पूजा प्रारंभ करें। इसके लिए किसी बड़े अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है। शुद्ध भावना और श्रद्धा ही सबसे महत्त्वपूर्ण है। अतः पूजा में आसन केवल शरीर को बैठाने का साधन नहीं, बल्कि स्थिरता, स्वच्छता और साधना के अनुशासन का आधार है। प्रत्येक व्यक्ति को यथासंभव अपना अलग और निश्चित आसन रखना चाहिए। आसन फट जाने पर उसे मरम्मत कराएँ या सम्मानपूर्वक बदल दें। आसन की पवित्रता साधक के मन की पवित्रता से जुड़ी होती है। स्वच्छ आसन, स्थिर शरीर और शांत मन से की गई पूजा ही साधना को भावपूर्ण बनाती है।