पुराने और वरिष्ठ कार्यकर्ता भाजपा की संगठनात्मक पूंजी है

AYUSH ANTIMA
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भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक व्यवस्था उसकी जीत का सबसे प्रमुख आधार है। यह पार्टी महज एक राजनीतिक दल ने होकर कैडर आधारित और कार्यकर्ता केन्द्रित लोकतांत्रिक आंदोलन बनाती है। भाजपा की कार्यप्रणाली जमीनी स्तर से शुरु होती है, प्रत्येक मतदान केंद्र पर पार्टी की समर्पित समितियां होती है, जो मतदाता सूचियों के विश्लेषण और घर घर सम्पर्क के जरिये सीधा जन सम्पर्क बनाए रखती है। पार्टी का पदानुक्रम उपर से नीचे तक राष्ट्रीय, राज्य, जिला, मंडल और बूथ स्तर पर बहुत अनुशासित है। पार्टी की विचारधारा एकात्म मानववाद और राष्ट्रीय सिध्दांतों पर आधारित होती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से इसके वैचारिक और संगठनात्मक संबंध है, जो पार्टी को वैचारिक प्रतिबद्धता और प्रतिबद्ध स्वयंसेवक और जमीनी फीडबैक का मजबूत तन्त्र प्रदान करता है। परिवारवाद से दूरी और एक व्यक्ति एक पद इसकी मूल अवधारणाओ में रही है।
भारतीय जनता पार्टी के मूल व पुराने कार्यकर्ता पार्टी की मूल विचारधारा के सबसे बड़े संरक्षक होते हैं। वे नई पीढ़ी को पार्टी के संस्कारों और इतिहास से जोड़ते हैं। यह समर्पित कार्यकर्ता अपने क्षेत्र में पार्टी का मजबूत आधार होते हैं। जनता से उनका सीधा व व्यक्तिगत जुड़ाव ही जीत का मार्ग प्रशस्त करता है। यह वह कर्मठ लोग हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों और जमीनी स्तर से पार्टी को सींच कर इस मुकाम तक पहुचाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। अब यदि भारतीय जनता पार्टी के झुनझुनु जिलाध्यक्ष को उपरोक्त परिपेक्ष्य में देखें तो पार्टी के मूल सिद्धांतो से विपरीत नजर आता है। उनके मनोनयन में परिवारवाद की बू नजर आने के साथ ही एक व्यक्ति एक पद के सिध्दांत को दरकिनार किया गया है। उनका मनोनयन ही विवादों में रहा है और एक साल के कार्यकाल के बाद भी यह विवाद उनका पीछा नहीं छोड़ रहे क्योंकि यह उनकी कार्यशैली का ही परिणाम है कि पार्टी के पुराने व अनुशासित कार्यकर्त्ताओं से दूरी व आयातित नेताओं को तवज्जो दे रही है, जिसके कारण पार्टी के कार्यकर्ताओं में असंतोष ही नहीं बल्कि आक्रोश भी है। वैसे भी जिले में पार्टी विधानसभा चुनावों मे कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाई थी और अब वर्तमान जिलाध्यक्ष की कार्यशैली इस हार की आग मे घी का काम कर रही है।
जनसंघ और उसके बाद भाजपा का दौर जिले में चरणबद्ध संपर्क और विकास का रहा है। मूल रूप से शहरी क्षेत्र की पार्टी कहलाने वाली भाजपा ने ग्रामीण क्षेत्र में भी पहचान बनाई तो खेती किसानी से जुड़े बड़े नाम वाले लोग जुड़े कुछ युवा लोग भी जुड़े पर जिले में जिन्होंने भाजपा को खड़े होते देखा है, काम किया है, उन सबको छोड़कर पैराशूट से उतरने वाले संगठन के वर्तमान मुखिया ने उसकी कार्य पद्धति ने सबको निराश किया है। विशेषकर वैचारिक कार्य पद्धति के प्रमाणिक चेहरे तो पूरी तरह दूर कर दिए गए हैं। मौकापरस्त आधिकारिक अवसरवादी लोगों का जमावड़ा बन गई है। जिले में कांग्रेस का विकल्प और नीचे तक संकल्प वाले लोग साइड कर दिए गये। जिले में भाजपा की उत्साही राजनीति को व्यक्तिवादी परिवारवादी मानसिकता के फैसलों ने निराशा के अंधकार में धकेल दिया है। आज जिनके भरोसे जिले में पार्टी चल रही है, वह तो डबल इंजन की सरकार का लाभ लेने वाले लोग हैं, सरकार नहीं तो वह लोग भी पार्टी के नहीं यह प्रमाणिक सत्य कभी भी सामने आ सकता है। जिले में राजनीतिक बदलाव के नाम पर केवल चेहरे बदले हैं, सिस्टम में कोई बदलाव लाने का काम नहीं हुआ।

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