रानीवाड़ा/जालौर (महेन्द्र देवासी): गुजरात के कच्छ जिले के मुख्य शहर श्री भुज में, श्री तपगच्छ जैन संघ द्वारा आयोजित प्रवर्तिनी साध्वीश्री पुण्यरेखाश्रीजी के संयम स्वर्ण महोत्सव और 500वें तथा 501वें दीक्षा मुहूर्त के इस दो दिवसीय ऐतिहासिक महोत्सव के अवसर पर, चातुर्मास निश्रादाता श्रमणीगणनायक जैनाचार्य श्री रश्मिरत्न सूरीश्वरजी महाराज आदि 36 साधु-साध्वी भगवंतों का गाजे-बाजे के साथ भव्य नगर प्रवेश कराया गया। वाणियावाड़ स्थित नूतन तपगच्छ उपाश्रय के विशाल हॉल में मांगलिक क्रियाओं के बाद, पाठशाला के छोटे-छोटे बच्चों ने शासन ध्वज के साथ भक्ति नृत्य प्रस्तुत किया। इस दौरान 'संयम रंग लाग्यो' विषय पर व्याख्यान हुए। दोपहर में, परमात्मा अरिहंत देव की पंचकल्याणक पूजा साध्वी भगवंतों की निश्रा में महिलाओं द्वारा पढ़ाई गई और छोटी-छोटी बालिकाओं ने सुंदर नृत्य प्रस्तुत किए।
*संयम के 50 वर्ष: रतन से जिनशासन के रत्न बनने का सफर*
महोत्सव के दूसरे दिन, मंगलवार को 'संगीत के सथवारे सुवर्ण संयम की संवेदना' कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अवसर पर प्रवचन देते हुए जैनाचार्य श्री रश्मिरत्नसूरीजी ने कहा "सत्त्व और शौर्य के बिना संयम की प्राप्ति नहीं होती। तीर्थंकर परमात्मा और सद्गुरु की कृपा के बिना संयम जीवन में सफलता के शिखरों पर नहीं चढ़ा जा सकता। उन्होंने अपनी बड़ी बहन महाराज (साध्वीजी)—जो राजस्थान के पादरली गाँव की 'रतन' थीं, के जिन शासन की 'रत्न' बनने तक के सफर और उनकी जिनाज्ञा के प्रति अटूट प्रेम के साथ बीते 50 वर्षों के संयम जीवन की यात्रा की भावपूर्ण स्मृतियाँ साझा कीं। इस दौरान पूज्य आचार्य भगवंत आत्मदर्शनसूरीजी ने भी पधारकर अपने आशीर्वाद दिए।
*700 साल बाद बनी अद्भुत ऐतिहासिक घटना*
सकल जैन संघ ने 'आरुग्ग बोहिलाभं' के नारों के साथ अपनी मंगलकामनाएँ प्रेषित कीं। इस ऐतिहासिक प्रसंग पर अपना संपूर्ण जीवन जिनशासन को समर्पित करने के लिए तत्पर दो कॉलेज छात्रा (युवतियों) को दीक्षा का मुहूर्त प्रदान किया गया।
* 500वां मुहूर्त: 24 वर्षीय मुमुक्षु आश्नी तरुणकुमार को दिया गया। वे मूल रूप से राजस्थान के वासा की रहने वाली हैं और वर्तमान में आंध्र प्रदेश के पीठापुरम में रहती हैं।
* 501वां मुहूर्त: 19 वर्षीय मुमुक्षु आयुषी को दिया गया। वे मूल रूप से टाणा की निवासी हैं और वर्तमान में मुंबई के डोंबिवली में रहती हैं। जैन इतिहास में 700 वर्षों के बाद ऐसी विरल और अद्भुत घटना का साक्षी बनने का सौभाग्य सभी को प्राप्त हुआ। दोनों मुमुक्षुओं को 27 जनवरी, 2027 का दीक्षा मुहूर्त दिया गया है।
*गुरुभक्तों का उमड़ा जनसैलाब*
इस पुण्य प्रसंग के सहभागी बनने के लिए पूज्य प्रवर्तिनी गुरुमैया के परिवारजन और भक्तगण मुंबई, अहमदाबाद, विशाखापट्टनम आदि दूर-दराज के शहरों से बड़ी संख्या में भुज पधारे। महोत्सव के दौरान सामूहिक आयंबिल और दोपहर में महिलाओं के लिए सामूहिक सामायिक का आयोजन किया गया। गुरुभक्तों की ओर से हर प्रसंग पर प्रभावना का लाभ लिया गया। इस अवसर पर साध्वीजी श्री ज्योतिरेखाश्रीजी ने भी अपने संयम जीवन के 34वें वर्ष में प्रवेश किया।
गुरुभक्तों और परिवारजनों ने जैन संघ के साधारण खाते में दान राशि (द्रव्य) अर्पित करने का लाभ लिया। संघ प्रमुख श्री कीर्तिभाई ने समस्त ट्रस्ट की ओर से आभार विधि संपन्न करते हुए भावुक होकर कहा कि, "हमें तो बिना मांगे ही मिश्री (पतासा) मिल गई है। इस अनोखे लाभ को पाकर हम खुद को धन्य महसूस कर रहे हैं।" उन्होंने आगे जोड़ते हुए कहा, "यह तो केवल झांकी है, अभी तो चातुर्मास प्रवेश और पूरा चातुर्मास बाकी है।"
आगामी 15 जुलाई को होने वाला चातुर्मास प्रवेश अत्यंत भव्य और ऐतिहासिक रूप से कराया जाएगा।