झुंझुनू (राजेन्द्र शर्मा झेरलीवाला): शहर की तंग गलियां और पुराने बाजार, जो कभी ग्राहकों की चहल-पहल से गुलजार रहते थे, आज वीरान पड़े हैं। दुकानों के बाहर टंगे ‘सेल’ के बोर्ड भी ग्राहकों को नहीं बुला पा रहे। कारण, शहर के पॉश इलाकों में सालभर लगने वाले निजी मेले, जिन्होंने स्थानीय व्यापारियों की कमर तोड़ दी है।
*त्योहार हमारा, फायदा बाहरवालों का*
शहर के एक मध्यमवर्गीय व्यापारी विनीत का दर्द छलक पड़ा कि पहले ही ऑनलाइन और बड़े शहरों की मार से व्यापार ठप पड़ा है। ऊपर से हर गली-मोहल्ले में रोज कोई न कोई मेला लग जाता है। कपड़े, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स - सब कुछ सस्ते के नाम पर बेच दिया जाता है। ग्राहक वहां चला जाता है, और हम दिनभर मक्खी मारते हैं। व्यापारियों का कहना है कि उन्हें सरकारी मेलों से कोई आपत्ति नहीं। साल में एक-दो बार लगने वाले सरकारी मेले तो परंपरा हैं, रोजगार भी देते हैं लेकिन निजी आयोजक बिना किसी नियम-कायदे के हर महीने पॉश कॉलोनियों में तंबू गाड़ देते हैं। बिजली, सफाई, पार्किंग का खर्चा नहीं, टैक्स की जवाबदेही नहीं। नतीजा-स्थानीय दुकानदार, जो दुकान का किराया, बिजली बिल, जीएसटी और स्टाफ की तनख्वाह देता है, वो प्रतिस्पर्धा में ही नहीं टिक पा रहा। 40 साल से कपड़े की दुकान चला रहे एक बुजुर्ग व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पिछले 5 साल में बिक्री 70% गिर गई है। त्योहारों के सीजन में भी दुकान सूनी रहती है क्योंकि बगल वाले ग्राउंड में ‘रक्षा बंधन धमाका मेला’ लगा है। हमने कई बार नगर परिषद और जिला प्रशासन को ज्ञापन दिया कि इन अवैध मेलों पर रोक लगे, पर हर बार आश्वासन ही मिला। व्यापार मंडल का आरोप है कि ये मेले ‘दुकानों’ का ही रूप हैं, जिन्हें ‘मेले’ का नाम देकर नियमों से बचाया जा रहा है। न फायर सेफ्टी, न पार्किंग की व्यवस्था, न स्थानीय रोजगार। मुनाफा कमाकर आयोजक चले जाते हैं, और पीछे रह जाता है कर्ज में डूबा स्थानीय व्यापारी।
*प्रशासन से गुहार: "सुकून से जीने दो"*
व्यापारियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि मामले पर गंभीरता से विचार हो। साल में केवल 1-2 सरकारी मेले ही लगें, पॉश इलाकों में रोज-रोज लगने वाले निजी मेलों को ‘अवैध दुकान’ मानकर तुरंत प्रतिबंधित किया जाए व मेले की अनुमति से पहले स्थानीय बाजार पर पड़ने वाले असर का आंकलन जरूरी हो। विनीत कहते हैं कि हम बड़ी मांग नहीं कर रहे। बस इतना चाहते हैं कि हमें भी ईमानदारी से अपना व्यापार करने का हक मिले। बच्चों का पेट पालना मुश्किल हो गया है। क्या झुंझुनू का व्यापारी अपने ही शहर में पराया हो गया है। फिलहाल झुंझुनू के बाजारों में सन्नाटा है, और हर दुकानदार की आंखें प्रशासन के फैसले पर टिकी हैं। सवाल ये है कि क्या रक्षा बंधन से पहले इन दुकानों में फिर से रौनक लौटेगी, या मेलों के शोर में इनकी आवाज हमेशा के लिए दब जाएगी।