योगिनी एकादशी पर विशेष: प्यासे को पानी पिल

AYUSH ANTIMA
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हम अक्सर पुण्य की तलाश मंदिरों, व्रतों, तीर्थों और अनुष्ठानों में करते हैं। हाथ में माला हो, मुख पर भगवान का नाम हो और दिनभर उपवास किया जाए तो हमें लगता है कि धर्म का कर्तव्य पूरा हो गया लेकिन उसी समय यदि हमारे द्वार से कोई प्यासा लौट जाए, सड़क पर कोई पशु पानी खोजता रहे या कोई पक्षी खाली पात्र के पास बैठा रहे, तो एक प्रश्न अवश्य उठता है कि क्या केवल भूखे रहना ही व्रत है या किसी की प्यास बुझाना भी भगवान की पूजा है।
योगिनी एकादशी भगवान विष्णु की उपासना, आत्मसंयम और आत्ममंथन का विशेष अवसर है। इस दिन व्रत, जप और पूजा का विधान है लेकिन धर्म का वास्तविक सौंदर्य तब प्रकट होता है, जब साधना के साथ सेवा भी जुड़ती है।
मनुष्य स्वयं अन्न त्याग दे, यह तप है, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखे, यह संयम है लेकिन किसी भूखे को भोजन दे और प्यासे को पानी पिलाए, यह करुणा है। जब तप, संयम और करुणा एक साथ जुड़ते हैं, तभी व्रत केवल कर्मकांड न रहकर सच्ची साधना बनता है।

*भगवान को जल चढ़ाते हैं, तो प्यासे को जल क्यों नहीं*

हम प्रतिदिन भगवान को स्नान कराते हैं, शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं, तुलसी और पीपल को जल अर्पित करते हैं, पूजा के कलश में जल को पवित्र माना जाता है। जब पूजा में जल इतना महत्वपूर्ण है, तो किसी प्यासे जीव के लिए वही जल साधारण कैसे हो सकता है।
मंदिर में चढ़ाया गया जल हमारी श्रद्धा है, लेकिन प्यासे के कंठ तक पहुंचा जल हमारी श्रद्धा की परीक्षा है। यहां पूजा और सेवा में किसी एक को चुनने का प्रश्न नहीं है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। पूजा हमें ईश्वर से जोड़ती है और सेवा हमें ईश्वर की सृष्टि से। जो भगवान को मानता है, उसे भगवान की बनाई हुई सृष्टि की पीड़ा भी समझनी चाहिए।

*योगिनी एकादशी हमें कर्तव्य की याद दिलाती है*

योगिनी एकादशी से जुड़ी कथा में कुबेर के सेवक हेममाली का प्रसंग आता है। कर्तव्य से विमुख होने के कारण उसे दुख और कष्ट भोगना पड़ा। बाद में योगिनी एकादशी के व्रत और आत्मशुद्धि से उसके जीवन में परिवर्तन आया। इस कथा को केवल चमत्कार की कहानी मानना पर्याप्त नहीं है। इसका संदेश गहरा है कि कर्तव्य की उपेक्षा भी जीवन में दुख का कारण बन सकती है। आज हमारा कर्तव्य केवल अपने घर और परिवार तक सीमित नहीं है। समाज, प्रकृति, पशु-पक्षी और जरूरतमंद व्यक्ति भी हमारे उत्तरदायित्व का हिस्सा हैं।
इसलिए एकादशी पर स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या मेरे कारण किसी को दुख पहुंचा, क्या मैंने किसी जरूरतमंद की उपेक्षा की, क्या सामर्थ्य होते हुए भी मैंने सेवा से मुंह मोड़ा, क्या मेरा धर्म केवल पूजा तक सीमित हो गया, यही आत्ममंथन व्रत को सार्थक बनाता है।

*प्यास जाति, धर्म और पद नहीं पूछती*

प्यासे व्यक्ति को पानी देते समय उसका धर्म नहीं पूछा जाता। गाय, कुत्ता या पक्षी पानी पीते समय हमारा नाम नहीं जानता। राहगीर को जल देते समय उसका पद नहीं देखा जाता, यही सेवा की सबसे बड़ी पवित्रता है।

*जहां अपेक्षा समाप्त होती है, वहीं से पुण्य का भाव शुरू होता है।*

किसी बड़े आयोजन में सेवा करना भी अच्छा है, लेकिन बिना दिखावे के किसी प्यासे के लिए पानी का पात्र रखना भी उतना ही बड़ा आध्यात्मिक कार्य हो सकता है। किसी के लिए एक गिलास पानी छोटी बात हो सकती है, लेकिन जिसे तीव्र प्यास लगी हो, उसके लिए वही जल संसार की सबसे कीमती वस्तु बन जाता है।

*क्या केवल स्वयं जल त्याग देना ही पुण्य है*

व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इंद्रियों को अनुशासित करना है। उपवास हमें इच्छाओं पर नियंत्रण करना सिखाता है लेकिन एक विचित्र स्थिति तब बनती है, जब मनुष्य स्वयं पुण्य के लिए जल त्याग दे और उसके घर के बाहर पशु-पक्षियों के लिए पानी का पात्र खाली पड़ा हो। इसलिए धर्म के बाहरी रूप से आगे जाकर उसके भाव को समझना जरूरी है। आप परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत करें, जप करें, पूजा करें, लेकिन साथ ही यह भी देखें कि किसी राहगीर को शीतल जल मिल सकता है क्या, किसी श्रमिक के लिए पानी की व्यवस्था हो सकती है क्या, छत पर पक्षियों के लिए जल रखा जा सकता है क्या और घर के बाहर पशुओं के लिए स्वच्छ पानी उपलब्ध कराया जा सकता है क्या।
अपने लिए उपवास और दूसरे के लिए उपकार—यही व्रत को व्यापक बनाता है।

*जीव सेवा भी विष्णु तत्व की उपासना है*

भगवान विष्णु सृष्टि के पालन के प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए विष्णु उपासना केवल मंदिर तक सीमित नहीं हो सकती। पालन, संरक्षण, दया और संतुलन भी विष्णु तत्व के भाव हैं। जब हम किसी जीव की रक्षा करते हैं, प्यासे को जल देते हैं, भूखे को भोजन देते हैं या असहाय की सहायता करते हैं, तब हमारी साधना व्यवहार में उतरती है। धर्म की असली परीक्षा पूजा समाप्त होने के बाद शुरू होती है।

* मंदिर से बाहर निकलने के बाद हमारा व्यवहार कैसा है। 
* व्रत के बाद हमारी वाणी कैसी है।
* जप के बाद हमारे भीतर कितनी करुणा है।
यदि क्रोध वही है, कटुता वही है, अहंकार वही है और संवेदना कहीं दिखाई नहीं देती, तो हमें अपने व्रत के भाव पर पुनर्विचार करना चाहिए।
व्रत की पूर्णता केवल इस बात में नहीं है कि हमने दिनभर क्या नहीं खाया, यह भी देखना चाहिए कि उस दिन हमने किसी को क्या दिया।
उपवास स्वयं पर संयम है और जलदान दूसरे के दुख पर करुणा। जब संयम और करुणा एक साथ आते हैं, तभी व्रत साधना बनता है।

*इस योगिनी एकादशी पर एक छोटा संकल्प लिया जा सकता है—*

किसी प्यासे को जल दें, पक्षियों के लिए जल पात्र रखें, पशुओं के लिए स्वच्छ पानी की व्यवस्था करें और राहगीरों को शीतल जल उपलब्ध कराएं।

*सेवा बड़ी हो, यह जरूरी नहीं। भावना पवित्र हो, यह जरूरी है।*

अंततः एकादशी का सबसे सुंदर संदेश यही हो सकता है कि भगवान को चढ़ाया गया जल श्रद्धा है, और प्यासे को दिया गया जल जीवंत पूजा।

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