खुद कमाया कांमड़ा कीनै दीज्यो दोष

AYUSH ANTIMA
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एक मारवाड़ी की प्रचलित कहावत है कि खुद कमाया कांमड़ा कीनै दिज्यो दोष भावार्थ है कि जब खुद ही ग़लत व्यक्ति का चयन करते गये व जब समस्या का समाधान नहीं हो रहा तो दोषारोपण पर उतारू हो जाते हैं। उपरोक्त कहावत झुंझुनूं जिले के मतदाताओं पर खरी उतरती है। जिस नेता को यमुना जल को लेकर मुद्दे पर वोट देते आये लेकिन उस नेता ने इस मुद्दे का दोहन किया व परिवारवाद को बढ़ावा दिया। अब जब घोर जल संकट सामने है तो सरकारों को दोषारोपण करते हैं। मतदान के समय जातिवाद हावी हो जाता है, यही मूल कारण है कि कोई निस्वार्थ भाव से जनसेवा करने वाला व्यक्ति चुनावों से किनारा कर लेता है क्योंकि उसको पता है कि जातिवाद की यह राजनिति उसको चुनावों में टिकने नहीं देगी। इसी जातिवाद की राजनीति की बुखार के चलते राजनीतिक दल केवल एक विशेष जाति के उम्मीदवार को ही टिकट देते हैं। अपवाद के रूप में जरूर एक दो बार अन्य जाति का नेता विजयी हुआ है। 
इसी के चलते यदि झुंझुनूं विधानसभा की बात करें तो जिले के विकास को लेकर व अभी बरसात की वजह से झुंझुनू शहर जलमग्न होने को लेकर नेताओं को कोसते रहते हैं लेकिन शायद उनको पता नहीं होगा कि उन्हीं के वोट से लगातार तीन बार विधायक बने थे। यदि वह नेता जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दे तो बार बार उसको क्यों मौका दिया जा रहा था। यदि मौका दे रहे थे तो फिर इन समस्याओं को लेकर सरकार व जन प्रतिनिधि को दोषी क्यों ठहराया जा रहा है। किसी भी नेता की जनहित के मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता एक कार्यकाल में ही उजागर हो जाती है फिर उसकों लगातार तीन कार्यकाल देकर क्यों ढोया गया। इसी क्रम मे अब डबल इंजन सरकार का उद्घोष हो रहा है लेकिन संगठन व सरकार में जो समन्वय नहीं है, वह साफ दिखाई दे रहा है‌, उसी का फायदा अफसर उठा रहे हैं। नगर परिषद आयुक्त की सीट को फुटबाल बना दिया है। यदि जन प्रतिनिधि स्थानांतरण करवाता है तो संगठन को रास नहीं आता और यदि संगठन करवाता है तो विधायक को रास नहीं आता। वैसे पूरे जिले मे ही अफसरशाही का यह आलम है कि झुनझुनु जिले मे ट्रांसफर उद्योग चरम पर है। जिला मुख्यालय पर साफ सफाई का यह आलम है कि गलियों में कूड़े के ढेर की खबरें जिले की शान मे कशीदे पढ़ रही है। संगठन की तरफ से आज तक किसी पदाधिकारी ने इस समस्या को लेकर आवाज नहीं उठाई। स्थानीय नेता जब कोई सरकार का मंत्री या संगठन का पदाधिकारी आता है तो उसको माला व साफा पहनाने की होड़ लग जाती है और इसी काम को जनता के प्रति संवेदनशील होने का प्रमाण मान लेते हैं। क्या जनता की आवाज बनकर सरकार के मंत्रियों या संगठन के पदाधिकारियों को समस्या से अवगत नहीं करवाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं तो फिर भीड़ तंत्र का हिस्सा बनने और दोषारोपण करने की जरुरत नहीं होनी चाहिए। जब जनता जन प्रतिनिधियों से जवाबदेही का हिसाब मांगना शुरु कर देगी तो निश्चित रूप से जनहित के कार्य होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए। झुंझुनूं विधानसभा उपचुनाव ने कांग्रेस के अजेय दुर्ग को ध्वस्त किया, उसको लेकर भाजपा को जनता की ताकत का अंदाजा हो जाना चाहिए कि वह अर्श से फर्श पर लाने में समय नहीं लगाती लेकिन संगठन की जनता के प्रति अकर्मण्यता और विधायिका के साथ समन्वय नही है, जिसका खामियाजा जनता भुगत रही है। जब जिला मुख्यालय पर यह हालात हैं तो अन्य विधानसभाओं की बात करना बेमानी होगा। अब जिले की इस अजीब स्थिति को लेकर यही कहा जा सकता है कि खुद कमाया कामड़ा कीनै दिज्यो दोष।

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