विधायक व संगठन में समन्वय कितना जरूरी

AYUSH ANTIMA
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विधायक व जिला संगठन जिलाध्यक्ष में समन्वय किसी भी राजनीतिक दल की सफलता, जनहित के कार्यों और जमीनी पकड़ के लिए अत्यन्त आवश्यक है। विधायक और संगठन के बीच का तालमेल पार्टी को जनता के बीच जबाबदेह बनाता है। संगठन में कार्यकर्ता जमीन पर पार्टी की रीढ़ होते हैं। विधायक और संगठन के बीच तालमेल होने से कार्यकर्ताओं का सम्मान सुरक्षित रहता है और वे पूरे जोश के साथ काम करते हैं। संगठन के माध्यम से विधायक तक आमजन की समस्याएं सीधी पहुचती है। इससे विधायक को अपने क्षेत्र में विकास कार्यों और जनहित की योजनाओं को लागू करने में मदद मिलती है। संगठन ही सरकार की नितियों व विधायक द्वारा करवाए गये जनहित के कामों को जनता तक पहुंचाता है और जनता की प्रतिक्रिया विधायक के संज्ञान में लाता है। यह सेतु जितना मजबूत होगा, पार्टी की स्थिति उतनी ही मजबूत होगी। किसी भी दल में विकास और जन कल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए यह अनिवार्य होता है कि दोनो एक दूसरे के पूरक होकर कार्य करें।
यदि उपरोक्त तथ्यो को झुनझुनु जिला संगठन की कार्यप्रणाली के संदर्भ में देखें तो संगठन और विधायक एक तरह से चुंबक के नोर्थ और साउथ पोल की तरह काम कर रहे हैं, जिनका मिलना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव है। अभी हाल ही में शेखावाटी की महत्वाकांक्षी परियोजना यमुना जल को लेकर जो समझौता हुआ था, उसको लेकर मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की आभार रैली का आयोजन किया गया, उसमें विधायक और संगठन में समन्वय का अभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिला। इस परियोजना को लेकर पूर्व सांसद नरेन्द्र खींचड़ के प्रयासों के पुल बांधे गये जबकि पूर्व सांसद संतोष अहलावत ने जो प्रयास किए थे, उसको लेकर एक शब्द भी नहीं बोला गया। विधायक और संगठन में तालमेल का एक नायाब नमूना देखने को मिला कि नवलगढ़ विधायक विक्रम सिंह जाखल का मंच से नाम लेना ही उचित नहीं समझा जबकि पूर्व विधायको के नाम बड़े अदब से लिए गये। संगठन व झुंझुनूं विधायक में समन्वय न होने का खामियाजा झुंझुनूं की जनता को भुगतना पड़ रहा है क्योंकि डबल इंजन सरकार के आने के बाद झुनझुनु नगर परिषद आयुक्त के पद को फुटबाल बना दिया है कि चार आयुक्तो का तबादला हो चुका है। अब यह तो जिलाध्यक्ष व विधायक ही जबाब दे सकते हैं कि आखिर यह क्यों हो रहा है। विधायक और जिलाध्यक्ष की खींचतान का ही नतीजा है कि जिलाध्यक्ष अपनी पूरी टीम की घोषणा अभी तक नहीं कर पाई है और जो दायित्व संगठन में विधायक के करीबियों को मिले हुए हैं, उनको अलग थलग करने की कवायद हो रही है। इसमें संदेह नहीं कि सेनापति को ही जीत का श्रेय जाता है लेकिन सैनिकों के शौर्य को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। क्या झुनझुनु में जो भी अभी तक काम हुए हैं, उसमें विधायक राजेंद्र भांभू का कोई योगदान नहीं। यदि है तो उनका नाम लेने से जिलाध्यक्ष परहेज़ क्यों करती है। सरकार में कोई भी काम विधायक की अनुशंसा बिना संभव नहीं क्योंकि वह जनप्रतिनिधि हैं और संगठन का पद पार्टी की मेहरबानी का पद होता है।

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