भारतीय न्याय शास्त्र का मूल सिद्धांत है कि "सौ गुनहगार छूट जाएं, पर एक बेगुनाह को सजा न मिले।" लेकिन वर्तमान में वैवाहिक विवादों, विशेषकर धारा 498-A के मामलों में यह सिद्धांत अक्सर उल्टा होता दिखाई देता है। यहाँ 'आरोप' को ही 'सजा' मान लिया जाता है, जिससे निर्दोष व्यक्ति और उसका परिवार वर्षों तक मानसिक तनाव, सामाजिक कलंक और कानूनी चंगुल में फंसा रहता है। इस विसंगति को दूर करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा राजस्थान की तर्ज पर एकीकृत दिशा-निर्देश जारी करना समय की मांग है। राजस्थान ने यह सिद्ध किया है कि यदि पुलिस 'डाकिया' बनने के बजाय एक 'निष्पक्ष अन्वेषक' की भूमिका निभाए तो झूठे मुकदमों की बाढ़ को रोका जा सकता है। राजस्थान पुलिस की वह 'साहसपूर्ण विवेचना', जो साक्ष्यों के अभाव में एफआर लगाने से नहीं हिचकती, अन्य राज्यों के लिए एक अनुकरणीय नजीर है। कई राज्यों में पुलिस आज भी केवल गिरफ्तारी के डर का उपयोग 'समझौते' के दबाव के रूप में करती है, जो सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन है। यदि केंद्रीय गृह मंत्रालय राजस्थान की तरह पूरे देश के लिए 'प्री-FIR इंक्वायरी' और 'अनिवार्य काउंसलिंग' के कड़े मानक तय कर दे, तो पुलिस की कार्यप्रणाली में 'मैकेनिकल' व्यवहार की जगह 'संवेदनशीलता' ले लेगी।
विशेष रूप से, 'सुरेश कुमार मीणा बनाम राजस्थान राज्य' जैसे न्यायिक उदाहरणों को आधार बनाकर केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि केवल वैवाहिक मुकदमे की लंबित स्थिति किसी युवक के करियर या सरकारी सेवा में बाधा नहीं बननी चाहिए। निर्दोषता के पूर्वाग्रह को केवल किताबी शब्द न रखकर उसे धरातल पर उतारने की आवश्यकता है। जब तक दोष सिद्ध न हो, तब तक किसी भी व्यक्ति को 'अपराधी' की तरह व्यवहार करना संवैधानिक मर्यादाओं के विरुद्ध है। इसके अतिरिक्त, राजस्थान की तरह ही 'झूठी शिकायत' दर्ज कराने वालों के विरुद्ध देशभर में सख्त दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। जब तक 'कानून का दुरुपयोग' करने वालों में सजा का डर नहीं होगा, तब तक 'कानून का उपयोग' करने वाले वास्तविक पीड़ितों को भी न्याय मिलने में देरी होती रहेगी। गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि पुलिस अधिकारी केवल शिकायत के पन्नों पर नहीं, बल्कि डिजिटल साक्ष्यों, कॉल रिकॉर्ड्स और जमीनी हकीकत पर भरोसा करें। यदि राजस्थान की इस 'विवेचनात्मक संवेदनशीलता' को राष्ट्रीय नीति के रूप में स्वीकार कर लिया जाए, तो न केवल निर्दोष व्यक्तियों को मानसिक यंत्रणा से मुक्ति मिलेगी, बल्कि युवाओं के भीतर विवाह संस्था के प्रति पनप रहा 'खौफ' भी समाप्त होगा। यह पहल समाज के बुनियादी ढांचे को बचाने और 'न्याय के शासन' को वास्तविक अर्थों में स्थापित करने के लिए एक 'अलार्म की घंटी' और 'उम्मीद की किरण' दोनों है। न्याय का तराजू तभी संतुलित होगा जब वह पूरे देश में एक ही मानक और एक ही संवेदनशीलता के साथ काम करेगा।