प्रमोद शर्मा क्यों हो गया अंडरग्राउंड: क्या गिरफ्तारी का हो गया था अंदेशा

AYUSH ANTIMA
By -
0



जयपुर के सत्ता के गलियारों में पिछले कुछ समय से हवाओं का रुख बदला-बदला सा था। गलियारों की कानाफूसी में एक ऐसा नाम गूंज रहा था, जिसके पास न कोई सरकारी पद था और न ही कोई संवैधानिक हैसियत, लेकिन उसकी मौजूदगी किसी भारी-भरकम 'सिस्टम' से कम नहीं थी। प्रमोद शर्मा नाम का यह किरदार धीरे-धीरे एक ऐसी 'अघोषित शक्ति' के रूप में उभरा, जिसने आधिकारिक कुर्सियों की चमक को अपनी सक्रियता से फीका करना शुरू कर दिया था। यह सिर्फ एक व्यक्ति का रसूख नहीं था, बल्कि प्रशासनिक तंत्र के भीतर विकसित हो रहा एक ऐसा समानांतर ढांचा था, जहां फैसलों की इबारत सरकारी फाइलों से पहले रसूख की बैठकों में लिखी जाने लगी थी। अफसरों की लगातार आवाजाही और उनके व्यवहार में दिखने वाली सतर्कता इस बात की तस्दीक कर रही थी कि सत्ता के मूल केंद्र के बगल में एक दूसरा केंद्र खड़ा कर दिया गया है। ​इस पूरे खेल की सबसे खतरनाक बुनियाद वह 'दावा' था, जिसे बड़ी ही चतुराई से प्रचारित किया गया। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के साथ नजदीकी के उस नैरेटिव को इस कदर फैलाया गया कि ब्यूरोक्रेसी का एक बड़ा हिस्सा भी इस भ्रम के जाल में फंस गया। नतीजा यह हुआ कि कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णयों में हिचक साफ दिखने लगी और तंत्र ने अनकहे डर के आगे घुटने टेक दिए। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत रसूख की कहानी नहीं कहती, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक तंत्र की उस कमजोरी को भी उजागर करती है, जहाँ 'निकटता' का भ्रम ही सबसे बड़ा आदेश बन जाता है। इस प्रभाव का इस्तेमाल केवल रसूख दिखाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरी राजनैतिक बिसात बिछाई जा रही थी। सांगानेर विधानसभा क्षेत्र, जो स्वयं मुख्यमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र है। यहां प्रमोद शर्मा की बढ़ती सक्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया था कि खेल केवल प्रभाव का नहीं, बल्कि सीधे सत्ता की जड़ पर कब्जा करने का था। रसूख और भ्रम की बुनियाद पर खड़ी ये इमारतें अक्सर कच्ची साबित होती हैं। जैसे ही जमीन कब्जे और धोखाधड़ी के आरोपों ने कानूनी शक्ल ली, इस 'समानांतर सरकार' का सारा तिलस्म बिखर गया। पुलिस की सक्रियता और नोटिसों के दौर के साथ ही वह चेहरा गायब हो गया, जो कल तक सत्ता का पर्याय बना हुआ था। जिस व्यक्ति की धमक से अफसर असहज हो जाते थे, उसका अचानक नदारद होना यह साबित करता है कि अनौपचारिक सत्ता का गुब्बारा कानून की एक सुई भर से फट सकता है। प्रमोद शर्मा का यह प्रकरण सिर्फ एक व्यक्ति की फरारी का मामला नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता पर एक बड़ा प्रहार है, जो तंत्र के भीतर रहकर तंत्र को ही बौना बनाने की कोशिश करती है। यह घटनाक्रम एक कड़ा सबक है कि लोकतंत्र में रसूख का नाम आदेश नहीं हो सकता और जब तक प्रशासनिक तंत्र ऐसी 'छद्म शक्तियों' के आगे झुकना बंद नहीं करेगा, तब तक ऐसे किरदारों का उदय और पतन होता रहेगा।

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!