निवाई (लालचंद माली): निवाई-पीपलू विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों लोकतंत्र की नई परिभाषा लिखी जा रही है। यहाँ सरकारी दफ्तरों में जनसेवा की फाइलों से ज्यादा 'ठेकेदारी' के एस्टीमेट और 'कमीशन' के गणित पर चर्चा होती है। रसूखदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने सरकारी सेवा को 'साइड बिजनेस' बना लिया है। हालत यह है कि साहब खुद कुर्सी पर बैठते हैं और उनके परिजन (पत्नी, भाई या साले) सरकार के समानांतर अपनी ठेकेदारी की दुकानें चला रहे हैं।
*ब्लैक लिस्टेड फर्म पर मेहरबानी: आखिर ये ‘रहस्यमयी’ ताकत कौन सी है*
पंचायती राज विभाग में चल रहा खेल अब सरेआम हो चुका है। चर्चा है कि एक साल से ब्लैक लिस्टेड होने के बावजूद एक रसूखदार फर्म ने दो दर्जन पंचायतों में टेंडर डाल दिए हैं। ताज्जुब की बात यह है कि इस फर्म के खिलाफ कोई प्रशासनिक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ रही। सरपंच और ग्राम विकास अधिकारी की ऐसी क्या मजबूरी है कि वे बार-बार इसी फर्म को 'अनुभव प्रमाण पत्र' बांट रहे हैं। 1970 के पुराने लाइसेंस के नवीनीकरण के बिना ही करोड़ों के काम देना, भ्रष्टाचार के गहरे नेटवर्क की ओर इशारा करता है।
*मंडी सचिव और भांजे का ‘कनेक्शन’*
भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कृषि मंडी सचिव पर अपने ही भांजे के नाम से टेंडर दिलवाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। रसूख का आलम यह है कि पंचायत समिति में एक खास कर्मचारी ने सालों से पैर जमा रखे हैं; सत्ता चाहे किसी की भी हो, 'वसूली अभियान' के दम पर वह हर बार खुद को सुरक्षित कर लेता है।
*एपीओ (APO) का डर: ईमानदार अधिकारियों की गर्दन पर लटकती तलवार*
वर्तमान में इस क्षेत्र में 'एपीओ' शब्द किसी डरावने सपने से कम नहीं है। सियासी आकाओं के इशारे पर तबादला, जांच और एपीओ करना बाएं हाथ का खेल बन गया है।
*टारगेट पर पुलिस और प्रशासन*
डीएसपी, सीआई, एईएन, जेईएन और पटवारी-गिरदावर जैसे फील्ड के अधिकारी हमेशा रडार पर रहते हैं।
*ईमानदारी की सजा*
हाल ही में निवाई में वर्षों से डटे एक ईमानदार अधिकारी को बिना किसी गलती के सिर्फ इसलिए 'एपीओ' कर दिया गया क्योंकि वे रसूखदारों के 'सिस्टम' में फिट नहीं बैठ रहे थे।
*सियासी चारागाह*
* पंचायती राज: यहाँ विकास के नाम पर वसूली का खुला खेल चल रहा है।
* राजस्व एवं पुलिस: ट्रांसफर-पोस्टिंग के डर से यहाँ के अधिकारी सियासी दबाव में काम करने को मजबूर हैं।
* पीडब्ल्यूडी और विद्युत: यहाँ ठेकेदारी के नाम पर अपनों को फायदा पहुँचाने की होड़ मची है।
*जनता की हुंकार: "विकास भगवान भरोसे"*
आमजन में इस व्यवस्था को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि:
"जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और कर्मचारी जनता की फाइल छोड़कर अपनी एलआईसी और पोस्ट ऑफिस की एजेंसी चमकाने लगें तो क्षेत्र का भला कैसे होगा। विधायक जी की नजदीकियों का रुतबा अब काम में नहीं, बल्कि कर्मचारियों को डराने-धमकाने में इस्तेमाल हो रहा है।"
*बड़ा सवाल: चुप्पी कब टूटेगी*
क्या जिला प्रशासन और राज्य सरकार इस 'डबल रोल' वाले नेक्सस पर लगाम लगाएगी। क्या उन कर्मचारियों की जांच होगी, जो सरकारी तनख्वाह तो ले रहे हैं, लेकिन काम अपने करीबियों की ठेकेदारी चमकाने का कर रहे हैं। निवाई-पीपलू की जनता अब जवाब चाहती है।
*क्या ईमानदार कलेक्टर टीना डाबी इस प्रकरण पर स्वत: संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच करवाने के बाद एक्सशन लेंगी या यूँ ही लीपापोती चलती रहेगी*