हरि रस माते मगन भये, सुमिरि सुमिरि भये मतवाले, जामण मरण सब भूलि गये॥ निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवै, आन न दूजा भाव धरै, सहजै सदा रामरंग राते, मुक्ति बैकुण्ठं कहा करें॥
गाइ गाइ रस लीन भये हैं, कछू न मांगें सन्त जना और अनेक देहु दत आगे, आन न भावै राम बिना॥ इकटग ध्यान रहैं ल्यौ लागे, छाक परे हरिरस पीवै। दादू मग्न रहैं रसि माते, ऐसे हरि के जन जीवें॥ हरि भक्ति रस के रसिक भक्त हरि रस में सदा डूबे रहते हैं। प्रतिक्षण हरि रस में डूबे हुए जन्म-मरण का जो यह संसार मार्ग है, उसको भी भूलकर हरिस्वरूप हो जाते हैं। आधुनिक भक्त भी प्रेम रस के पान में डूबे हुए सांसारिक भावनाओं को त्याग कर हरि का ही ध्यान करते रहते हैं। उनकी राम भक्ति स्वाभाविक है। इसलिये वे उस हरि भक्ति रस में अनुरक्त हुए वैकुण्ठादि चार प्रकार की मुक्ति को भी नहीं चाहते तो फिर स्वर्गादि सुखों के भोग की इच्छा की संभावना तो कैसे की जा सकती है। वे वैराग्य के द्वारा सब वस्तुओं को मिथ्या मान कर अनात्मभाव को
त्याग कर आत्मभाव को प्राप्त हो जाते हैं और अनिर्निमेषदृष्टि से प्रभु को देखते हुए तदाकार वृत्ति के द्वारा उसी में रमण करते हुए बार बार हरि रस को पीकर तृप्त रहते हैं। ऐसी जीवनचर्या से वे जीते रहते हैं। वास्तविक विचार से देखें तो प्रेम तत्व रसिकों की दृष्टि में मूक प्राणी के रसास्वादन की तरह है। आचार्यों ने लिखा है कि-परमानन्द स्वरूप भगवान् ही भक्तों के मन में आकर भगवदाकार मन की वृत्ति बनकर पुष्कल रसरूपता को प्राप्त हो जाते हैं। भागवत में पापों को नष्ट करने वाले भगवान् ही भक्तों के हृदय में आकर विराजते हैं और भक्तों के प्रेम से विवश होकर हृदय को कभी नहीं छोड़ते। जिनके हृदय में प्रेम रूपी रस्सी से बंधे हुए भगवान् के चरण कमल विराजते हैं, वे भक्तों में श्रेष्ठ भक्त माने जाते हैं। पृथुराजा कहता है कि-मोक्षपति प्रभो ! आप वर देने वाले ब्रह्मादि देवताओं को भी वर देने में समर्थ है। कोई भी बुद्धिमान् पुरुष आपसे देहाभिमानियों के भोगने योग्य विषयों की कैसे मांग सकता है। वे तो नारकी जीवों को भी मिलते रहते हैं। अब मैं इन तुच्छ विषयों की आपसे नहीं मांगता। मुझे तो उस मोक्ष पद की भी इच्छा नहीं, महापुरुषों के मुख द्वार से निकला हुआ आपके चरण कमलो का मकरन्द पीने के लिये इन दस हजार कानों से मिलता रहे। यह ही वरदान प्रदान करें।