संयुक्त परिवार टूटे, आदमी भी टूटा

AYUSH ANTIMA
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हमारी सामाजिक संरचना में संयुक्त परिवार केवल रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सशक्त पद्धति रहा है। यह वह व्यवस्था थी, जिसमें अनेक लोग एक ही छत के नीचे रहते हुए केवल रिश्तों से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों, संवेदनाओं और परस्पर सहयोग से जुड़े रहते थे। घर में बुजुर्गों का साया होता था, बच्चों की किलकारियाँ गूँजती थीं, युवाओं के कंधों पर श्रम का बल होता था और महिलाओं के त्याग, धैर्य तथा समर्पण से पूरा परिवार संस्कारों की डोर में बंधा रहता था। संयुक्त परिवारों की सबसे बड़ी शक्ति थी—साझेदारी। सुख हो या दुख, विवाह हो या बीमारी, खेती हो या व्यापार—हर काम में सबकी भागीदारी होती थी। घर का मुखिया केवल आदेश देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि संतुलन, अनुभव और निर्णय का केंद्र होता था। उसकी बात इसलिए मानी जाती थी, क्योंकि उसमें परिवार के हित की भावना निहित होती थी। साधन सीमित थे, सुविधाएँ कम थीं, फिर भी परिवारों में अपनापन, सामंजस्य और आत्मीयता का संसार जीवित था। कम संसाधनों में भी लोग स्वयं को समृद्ध महसूस करते थे, क्योंकि वे अकेले नहीं थे।
संयुक्त परिवार केवल आर्थिक सहारा नहीं था, वह भावनात्मक सुरक्षा का भी सबसे बड़ा आधार था। उसमें बच्चों को संस्कार मिलते थे, युवाओं को मार्गदर्शन मिलता था और बुजुर्गों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता था। परिवार का हर सदस्य किसी न किसी रूप में उपयोगी, आवश्यक और जुड़ा हुआ महसूस करता था। यही जुड़ाव परिवार को घर से आगे बढ़ाकर जीवन का सच्चा विद्यालय बना देता था। समय बदला और समाज भी बदला। पाश्चात्य जीवनशैली का प्रभाव बढ़ा, तकनीकी विकास हुआ, भौतिक सुविधाओं का विस्तार हुआ और जीवन की प्राथमिकताएँ बदलने लगीं। परम्परागत व्यवसाय कमज़ोर पड़ते गए, रोजगार के नए अवसरों ने लोगों को घर-परिवार से दूर किया और सुविधा की चाह ने सामूहिकता की जगह व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व देना शुरू कर दिया। इसी दौर में “छोटा परिवार” आधुनिकता का प्रतीक बनकर उभरा। पहली दृष्टि में एकल परिवार व्यवस्थित, स्वतंत्र और सुविधाजनक लगता है। पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित परिवार में निर्णय लेना आसान प्रतीत होता है लेकिन जीवन केवल सुविधा से नहीं चलता, उसे सहारे की भी आवश्यकता होती है। जब परिवार छोटा होता गया, तब जिम्मेदारियाँ बड़ी होती गई। बच्चों की परवरिश, आर्थिक दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ, बीमारी, सुरक्षा और भविष्य की चिंता—इन सबका बोझ सीमित कंधों पर आ गया। परिणाम यह हुआ कि आदमी बाहर से आधुनिक दिखा, पर भीतर से अकेला और थका हुआ होता गया। आज का व्यक्ति कमाता अधिक है पर चैन कम है। साधन बढ़े हैं पर संबंधों की ऊष्मा घटी है। घर बड़े हुए हैं, पर उनमें अपनापन छोटा हो गया है। संयुक्त परिवारों में जो भावनात्मक सुरक्षा मिलती थी, वह एकल परिवारों में अक्सर दुर्लभ होती जा रही है। माता-पिता को साझा जिम्मेदारी का संतुलन नहीं मिल पाता। यही कारण है कि मानसिक तनाव, पारिवारिक असुरक्षा और सामाजिक दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। सच यही है कि जब संयुक्त परिवार बिखरे, तब केवल घर नहीं टूटे, आदमी भी भीतर से टूट गया।

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