पानी मानव के लिए अति आवश्यक तत्व है अतीत। कालखंड में भामाशाह कुएं, बावड़ी, तालाब और प्याऊ का निर्माण कर पीने के पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करते थे। समय बदला भ्रष्टाचार रुपी दानव ने मानवता को गिरफ्त में लिया, उसी का परिणाम राजस्थान में जल जीवन मिशन में करोड़ों रूपये के घोटाले ने भ्रष्टाचारियो ने पानी को भी नहीं छोड़ा। भ्रष्टाचार हमारे सिस्टम को दीमक की तरह खोखला कर रहा है। यदि सरकारी महकमे की इच्छा शक्ति हो तो भ्रष्टाचारी कितना भी रसूखदार हो, उसे कानून के पंजे में आना ही होगा। आखिरकार वहीं हुआ, जल जीवन मिशन घोटाले के एक और बड़े आरोपी पूर्व आईएएस सुबोध अग्रवाल को गिरफ्तार कर ही लिया गया। उनकी गिरफ्तारी से प्रशासनिक हल्के में हड़कंप मच गया क्योंकि इस मामले में लिप्त बड़ी मछलियां भी इसकी जद में आने वाली है। अब माना जा रहा है कि कांग्रेस शासन के पूर्व मंत्री व राजस्थान सरकार के पूर्व मुख्य सचिव की मुश्किले बढ़ सकती है। सुबोध अग्रवाल बार बार कह चुके है कि जब उनके कार्यभार संभालने से पहले जलदाय विभाग के प्रमुख सुधांश पंत थे। टेंडरों की स्वीकृति और अन्य महत्वपूर्ण निर्णय पंत ने ही लिए थे। राजस्थान में जल जीवन मिशन महाघोटाला कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान हुआ था। यह एक बहुत ही बहुचर्चित भ्रष्टाचार का मामला है, जिसमें करीब 960 करोड़ की अनियमितता के आरोप है। जल जीवन मिशन योजना केन्द्र सरकार द्वारा ग्रामीण घरों में नल से जल पहुंचाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना है लेकिन राजस्थान में इसमें फर्जीवाड़े की पुष्टि हुई है, जिसमें झुंझुनूं, अलवर व जयपुर जिले प्रमुख हैं। जांच के दौरान सामने आया कि फर्मों को टेंडर दिलवाने के लिए फर्जी दस्तावेज इस्तेमाल किए गए थे। कथित तौर पर इरकान (IRCON) जैसी केन्द्रीय कंपनियों के जाली सर्टिफिकेट बनाकर टेंडर हासिल किए गये और पानी की पाइपलाइन व नल कनैक्शन के नाम पर करोड़ों रुपए का फर्जी भुगतान उठा लिया गया। इस मामले के आरोपी सुबोध अग्रवाल से करीब 12 घंटे की मैराथन पूछताछ में करीब 100 सवाल पूछे गये। एसीबी सुबोध अग्रवाल के जबाबों से संतुष्ट नहीं, इसके साथ ही पूर्व मंत्री महेश जोशी पर उनकी चुप्पी संदेह पैदा करती है। भारतीय राजनीति में राजनीतिक व प्रशासनिक गठजोड़ है और उसी की पुनरावृत्ति इस तरह के भ्रष्टाचार में देखी जा सकती है। सुबोध अग्रवाल की यदि चुप्पी टूटती है तो निश्चित रूप से इसकी गूंज सचिवालय से लेकर राजनीतिक गलियारों तक सुनाई देगी। इसमें संदेह नहीं कि इस महा घोटाले के अकेले किरदार सुबोध अग्रवाल नहीं है। इस पटकथा को लिखने में पीएचईडी के अफसर व सुबोध अग्रवाल के राजनीतिक आकाओं की भी अहम भूमिका है। बिना नौकरशाही की मिली भगत व राजनीतिक संरक्षण बिना भ्रष्टाचार संभव नहीं है। यह हमारे उस भ्रष्ट सिस्टम का परिणाम है, जिसकी मार आम आदमी झेल रहा है। निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि यदि सरकार की इच्छा शक्ति भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टोलरेंस की हो तो भ्रष्टाचारी कितना भी रसूखदार हो, वह बच नहीं सकता, आखिर उसे जेल की हवा खानी ही पड़ेगी।
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