आखिर रद्ध हुई बहुचर्चित एसआई भर्ती परीक्षा

AYUSH ANTIMA
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राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बहुचर्चित एसआई भर्ती परीक्षा 2021 को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए उसे पूरी तरह रद्द कर दिया। कोर्ट की खंडपीठ ने एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए 859 पदों की भर्ती को रद्द करने पर मुहर लगाई। यह फैसला पेपर लीक व इस भर्ती में व्यापक धांधली को देखते हुए आया है। खंडपीठ ने भाजपा सरकार व सफल अभ्यर्थियों के इस तर्क को नहीं माना, जिसमें कहा गया कि कुछ बेईमानी करने वाले अभियार्थीयो की सजा ईमानदार अभियार्थीयों को नहीं दी जा सकती है। खंडपीठ ने माना कि जब पेपर लीक की बात प्रमाणित हो चुकी है तो ईमानदार व बेईमान अभियार्थियो की बात करना बेमानी होगा। विदित हो भाजपा सरकार ने इस परीक्षा को रद्द न करने को लेकर अंतिम क्षणो तक कानूनी लड़ाई लड़ी थी। विधानसभा चुनावों में भी इस मुद्दे का खूब दोहन किया था कि कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार ने बेरोजगार युवाओं के सपनो के साथ खिलवाड़ किया है। जब भजन लाल शर्मा सरकार व भाजपा यह मान रही थी कि राजस्थान में बेरोजगार युवाओं के साथ अन्याय हुआ है तो इसको रद्द न करने को लेकर आखिर क्यों अड़ी रही। अपने निर्णय में माननीय कोर्ट ने राजस्थान लोक सेवा आयोग की भूमिका पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि आयोग की जिम्मेदारी थी कि परीक्षा निष्पक्ष व ईमानदार तरीके से करवाई जाए लेकिन इसमें सदस्यों की भूमिका संदिग्ध पाई गई। जांच एजैंसीयो ने भी आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की भूमिका को संदिग्ध माना था। यह सर्वविदित है कांग्रेस नीत गहलोत सरकार ने अपने चहेतों को आयोग मे सदस्य व अध्यक्ष नियुक्त किया, यही कारण है कि पेपर लीक प्रकरण में उनकी भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि आयोग में राजनीतिक नियुक्तियां नहीं होनी चाहिए। सरकार राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्तियो को लेकर पारदर्शिता वाला नया कानून लेकर आए। आयोग मे अध्यक्ष सहित 10 पद हैं। मौजूदा समय में 4 पद खाली है। आगामी जून में अध्यक्ष यूआर साहू का कार्यकाल भी पूरा हो रहा है व जुलाई माह मे दो सदस्य सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसका मायने यह हुआ कि भजन लाल शर्मा सरकार को 7 नियुक्तियां करनी है। यदि अतीत में देखा जाए तो आयोग में नियुक्तियां राजनीतिक नजरिए से ही होती आई है, चाहे वह कांग्रेस का शासन या भाजपा का शासन रहा हो। उन्हीं अफसरों को आयोग मे जगह भी दी जाती है, जो अपने सेवाकाल मे सरकारों के इशारो पर काम करते रहे हैं। यदि कांग्रेस के अशोक गहलोत सरकार की बात करें तो राजस्थान लोक सेवा आयोग भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया था। 
देखा जाए तो भाजपा की डबल इंजन सरकार की मंशा पर भी सवाल उठने लाजिमी है, जो भ्रष्टाचार के मामलों में जीरो टोलरेंस की बात करती रही है लेकिन उसने इस भर्ती परीक्षा को रद्द न करने को लेकर अंतिम क्षणो तक लड़ाई लड़ी। अब भजन लाल शर्मा सरकार पर आयोग की विश्वसनीयता को बरकरार रखने की जिम्मेदारी है और यह उनके द्वारा नियुक्तियों से स्पष्ट हो जाएगा कि वह माननीय कोर्ट के फैसले और भ्रष्टाचार को लेकर कितनी संवेदनशील है।

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