उर्दू और फ़ारसी अदब की विरासत संभालने वाले हिंदुस्तान के महान शायर रमज़ी इटावी का जन्म इटावा (उत्तरप्रदेश) में दिसंबर 1912 में हुआ और 5 अप्रैल 2002 को जोधपुर (राजस्थान) में आखिरी सांस ली लेकिन उनकी शायरी आज़ भी लोगों के दिलों में अपना मुकाम बनाए हुए है। उनका पूरा नाम ज़ुहूर अहमद था लेकिन उर्दू अदब में उन्हें उनके तख़ल्लुस (क़लमी नाम): रमज़ी इटावी से प्रसिद्धि मिली। उनके पिता मौला बख्श रहमानी भी स्वयं शायर थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू और अंग्रेज़ी में एमए किया। उन्होने शिक्षा विभाग में अध्यापन किया। आकाशवाणी जोधपुर से उनका कलाम प्रसारित होता रहा। अल्लामा सीमाब अकबराबादी उनके उस्ताद थे। ‘शायर’ पत्रिका में उनके लेखों का निरंतर प्रकाशन होता रहा। मशहूर शायर बिदल बदायूनी ने उनकी प्राकृतिक कविताओं से प्रभावित होकर उन्हें “मुसव्विर-ए-मंज़र” (दृश्य चित्रित करने वाला) की उपाधि दी। रमज़ी साहब तरन्नुम के बजाय ‘सादे अंदाज़ में कलाम पढ़ते थे, फिर भी पूरा मुशायरा लूट लेते थे। जयपुर में मिर्ज़ा इस्माइल की मेज़बानी में आयोजित मुशायरे में उन्होंने उस दौर के बड़े शायरों के साथ भाग लिया। वर्ष 1940 से 1980 के दशक तक उनकी व्यापक ख्याति रही। उर्दू की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में सम्मान के साथ प्रकाशित होते रहे। “सहरा में भटकता चाँद” (काव्य संग्रह) राजस्थान उर्दू अकादमी द्वारा प्रकाशित प्रमुख कृति है। उनका फ़ारसी काव्य अभी भी अप्रकाशित है। वर्ष 1929 में उनका लेखन प्रारंभ हुआ।
उन्हें अनेक महान हस्तियों जैसे पंडित जवाहर लाल नेहरू, मुंशी प्रेमचंद, हफ़ीज़ जालंधरी, अब्दुल माजिद दरियाबादी, शकील बदायूनी, कैफ़ भोपाली, जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी, फ़ानी बदायूनी, नयाज़ फ़तेहपुरी, निदा फ़ाज़ली, पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम आदि ने सराहा। उनकी रचनाएँ विभिन्न पुस्तकों और शोध कार्यों में शामिल की गईं। उन पर शोध (पीएचडी) भी हुआ। उनकी एक कविता पाँचवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल है, जिसमें उनका और हफ़ीज़ जालंधरी का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। वे राजस्थान उर्दू अकादमी की प्रथम जनरल काउंसिल के सदस्य रहे। राजस्थान वक़्फ़ बोर्ड और शिक्षा विभाग से भी जुड़े रहे। वे “दबिस्तान-ए-आज़ाद” (मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की विचारधारा पर आधारित संस्था) के संस्थापक थे। कैफ़ भोपाली से मुशायरे में उनका संवाद बहुत मशहूर रहा। जब कैफ़ भोपाली ने कहा—“मेरी क़दर कर ख़ुदाया कि तुझे ख़ुदा बना लिया…”तो रमज़ी साहब ने तुरंत जवाब दिया—“तू अदम में सो रहा था, ये हयात किसने बख़्शी…”उनकी इस हाज़िर जवाबी पर खूब दाद मिली। ईमान की कसौटी पर उनका एक शेर बहुत मक़बूल हुआ। उन्हें एक मिसरा दिया गया—“तुझसे मैं हरगिज़ न माँगूँ चाहे कुछ भी हो ख़ुदा…”उन्होंने पूरा शेर कहा—“काफ़िराना, मुशरिकाना ज़िंदगी की दुआ, तुझसे मैं हरगिज़ न माँगूँ चाहे कुछ भी हो ख़ुदा।” उनमें इतनी कुव्वत और सलाहियत थी कि वे अल्लामा इक़बाल तक के शेर को सुधार देते थे। जब किसी ने “समंदर से मिले प्यासे को शबनम…” कहा,तो रमज़ी साहब बोले— “शबनम नहीं, ‘क़तरा’ होना चाहिए—समंदर में शबनम कहाँ होती है!” इस पर सभी शायर दाद देते हुए हँस पड़े। प्रकृति चित्रण में अद्भुत दक्षता, गहरी आध्यात्मिकता के साथ चिंतन उनकी विशेषता थी। सरल किन्तु प्रभावशाली भाषा, ग़ज़ल और नज़्म दोनों में समान अधिकार उनके काव्य की विशिष्टता थी। उनके चयनित सुंदर अशआर इस प्रकार है-
गुलाब-ए-सुर्ख़ का जो मर्तबा है फूलों में, वही जनाबे मुहम्मद का है रसूलों में। मैं अगर चाहूँ तसव्वुर में करूँ उनसे कलाम,
मुझको आता है भरी बज़्म में तन्हा होना। सदियों से अम्न-ए-आलम का ख़्वाब देखते हैं, ताबीर से हो या रब दिल शादमाँ हमारा।
नज़्म: “मुतालआ-ए-फ़ितरत” (प्रकृति का अध्ययन)
चाँद तारों से मुझको उल्फ़त है,
कोहसारों से मुझको उल्फ़त है।
मैं गुलों से कलाम करता हूँ,
कहकशाँ को सलाम करता हूँ।
ठंडी-ठंडी सफ़ेद झीलें हैं,
जगमगाती हुई सबीलें हैं।
हुस्न-ए-फ़ितरत मुतालअे में है,
रूह गोया मुराक़बे में है।
मेरे अल्लाह ये क्या करिश्मा है,
ज़र्रा-ज़र्रा मक़ाम-ए-सजदा है।
रम्ज़ी इटावी उर्दू और फ़ारसी साहित्य के ऐसे महान शाइर थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं से प्रकृति, अध्यात्म और मानवीय मूल्यों को नई ऊँचाइयाँ दीं। वे न केवल एक उत्कृष्ट शाइर थे, बल्कि एक गंभीर चिंतक और प्रभावशाली गद्यकार भी थे। उनकी साहित्यिक विरासत आज भी शोध, पाठ्यक्रम और साहित्यिक चर्चाओं में जीवित है।