मद मंछर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान। सुपिनै ही समझे नहीं, दादू क्या अभिमान।। संतप्रवर ब्रह्मऋषि श्रीदादू जी महाराज कहते हैं कि जिस मनुष्य को स्वप्न में भी कभी जाति, विद्या, धन, कुल आदि का अभिमान स्पर्श भी नहीं करता, क्योंकि यह सब मिथ्या है। अतः अभिमान के योग्य नहीं है। यदि कोई इस मलिन वासना से पीड़ित रहता है तो उसको विवेक करना चाहिए। महात्मा राजा जनक ने बतलाया है, जो अपने को सबसे महान समझता है, उसका भी कुछ ही दिनों में अधोपतन हो जाता है। ऐसी महत्ता में कैसे विश्वास हो सकता है। बड़े-बड़े राजाओं का वह राजपाट कहाँ गया, अतः इस संसार में विश्वस्तता कहां है।करोड़ों प्राणी ब्रह्मलोक में चले गए हैं। कितने ही स्वर्ग चले गए हैं। राजा लोग धूल के कण की तरह नष्ट हो गए। अतः इस क्षण भंगुर जीवन की क्या आशा की जाए। अतः जिसने विचार के द्वारा जाती विद्या, धन, कुल आदि के अभिमान को त्याग दिया, वह मनुष्य देवतुल्य होकर परमात्मा का प्रिय बन जाता है।
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