सतगुरु मिलै तो पाइये, भगति मुक्ति भण्डार। दादू सहजै देखिये, साहिब का दीदार।।
संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि सद्गुरु भक्ति तथा मुक्ति के भंडार हैं। अतः जिसने सद्गुरु को प्राप्त कर लिया, उसके लिए भक्ति तथा मुक्ति दोनों ही दुर्लभ नहीं है। सतगुरु की कृपा से तो अविद्या के नष्ट हो जाने से श्रद्धा पैदा होती है। योगवासिष्ठ में किसी के हाथ में दीपक हो तो उसे अनायास ही सब वस्तुएं ज्ञात हो जाती है। उसी प्रकार ज्ञान दीपक जिनके अंतःकरण में पैदा हो गया, वह ब्रह्म तत्व को जानकर जागृत हो जाता है। अतः गुरु से ज्ञान प्राप्ति हेतु यतन करना चाहिए। महात्मा कविवर संतश्रीसुंदरदास जी महाराज ने कहा है कि जिस प्रकार चंदन वृक्ष अपने पास खड़े वृक्षों में भी अपने ही समान सुगंध तथा शीतलता उत्पन्न कर देता है। इसी तरह भँवरा साधारण कीट को अपनी गुँजन ध्वनि निरंतर सुनाकर अपने समान भँवरा बना लेता है, इसे देखकर लोग आश्चर्य करते हैं। यह बात सर्वजन प्रसिद्ध है कि कोई सच्चा गुरु शिष्य को सांसारिक बुद्धि को भी तत्काल ब्रह्मविचार में लगा देता है। गुरु के बिना किसी भी साधक को ज्ञान एवम ध्यान मार्ग नही मिल सकता।