जागत जहाँ जहाँ मन रहें, सोवत तहाँ तहाँ जाय। दादू जे जे मन बसै, सोइ सोइ देखे आय।। संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि यह मन जाग्रत अवस्था मे जिन जिन कर्मो को करता है, सोचता है या ध्यान करता है, उन्हीं 2 कर्मो के संस्कार प्रबल होने से स्वपन में भी उन्हीं कर्मो को सोचता या ध्यान करता है। इसलिये इन पदार्थों का संकल्प ही न करे अन्यथा उन पदार्थो में संकल्प करने से प्रीती बढ़ जाती है। इस प्रकार संकल्पो का नाश न होने से संसार का नाश भी नही होगा। योगवासिष्ठ में: है राम ! तुम संकल्प ही मत करो, उनकी स्थिति का विचार मत करो। इतने मात्र से ही तुम्हारा मन भव्य हो जायेगा और तुम कल्याण को प्राप्त हो जावोगे।" हे बुद्धिमान ! संकल्प के नष्ट होते ही मूल अविद्या सहित संसार का सारा दुख ही नष्ट हो जायेगा क्योकि सुख, दुख आदि संकल्प मात्र ही है। बुद्धि, मन, जीव, चित्त, वासना, यह सब संकल्प मात्र ही है। केवल नाम का ही भेद है, अर्थ में कुछ भी भेद नही है। अतः इस संसार मे संकल्प के अलावा कुछ भी नही है, जो स्वप्न मात्र है, उसको नष्ट करके सुखी हो जाओ, फिर चिंता से मुक्त हो जाओ।
3/related/default