हीरै रीझे जौहरी, खलि रीझे संसार। स्वांगि साधु बहु अन्तरा, दादू सति विचार।। संतशिरोमणि श्रीदादू जी महाराज कहते हैं कि प्रायः संसार के लोग सत्य असत्य का विवेक नहीं करते, इसलिए स्वांग धारण करने वाले साधु को देखकर साधुत्व बुद्धि से साधु का मान कर प्रसन्न होते हैं कि आज मेरे घर पर साधु पधारे हैं और अपना अहोभाग्य मानते है किंतु जो हरि के भक्त हैं, वे तो सच्चे हरि भक्त को देख कर ही प्रसन्न होते हैं। जैसे जौहरी अपने अभीष्ट हीरे को देखकर ही प्रसन्न होता है अतः सत्य असत्य का विचार करके ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि साधु और केवल भेषधारण करने वाले असाधु में बहुत भेद है। लिखा है जैसे पर्वत दूर से ही सुंदर लगते हैं, पास में जाने पर नहीं, ऐसे ही भेषधारी भी दूर से ही अच्छे हैं, उनके पास नहीं जाना चाहिए। पशु जैसे हरियाली को देखकर प्रसन्न होता है लेकिन उसके गुण अवगुणों को नहीं जानता।
श्रीमद्भागवत में जैसे आकाश और पृथ्वी में जितना भेद है, उतना ही भेषधारी स्वांगी और सच्चे संत में भेद है। अतः अमृतरूपी परमात्मा की प्राप्ति के लिये साधु का ही संग करो।