राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश मे कहा कि सरकारी परियोजनाओं के उद्धघाटन मे लगी पट्टिकाओ पर वर्तमान विधायक का नाम होना चाहिए, चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल का हो। निश्चित रुप से यह फैसला उस जनादेश का सम्मान है, जिसके बलबूते पर उनके द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व कर रहा है। डबल इंजन सरकार के गठन के बाद विधानसभा प्रत्याशी को भी संवैधानिक पद का दर्जा दे दिया था व ताबड़तोड़ उद्धघाटन उन्हीं के द्वारा होने लगे। देखा जाए तो सरकारी परियोजनाओं का उद्धघाटन आमतौर पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों द्वारा ही किया जाता है। सरकारी नियमों के तहत वरिष्ठ अधिकारी, मंत्री, सांसद व विधायक ही उद्धघाटन के लिए अधिकृत होते हैं लेकिन इसके लिए अंतिम निर्णय सरकारी अधिकारियों या संबंधित विभाग द्वारा प्रोटोकॉल के अनुसार ही होता है। यदि दूसरे शब्दों में यह कहें कि सरकारी परियोजनाओं के उद्धघाटन में किसी भी संगठन के नेता की भागीदारी के लिए सरकारी अनुमति और प्रशासनिक नियमों की अनुपालना अनिवार्य है। किसी भी सरकारी परियोजनाओं के उद्धघाटन में शिष्टाचार के अनुसार विपक्षी विधायक को आमंत्रित किया जाना चाहिए क्योंकि वह उस क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। विपक्षी विधायक सरकारी परियोजनाओं का उद्धघाटन कर सकते हैं यदि उन्हें सरकार या संबंधित विभाग द्वारा आमंत्रित किया गया हो। इस नव सृजित संस्कृति को लेकर चुरु विधायक नरेन्द्र बुडानिया, सूरजगढ़ विधायक श्रवण कुमार व पिलानी विधायक पितराम सिंह काला ने सार्वजनिक मंचों से व विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया था कि सरकारी परियोजनाओं का उद्धघाटन हारे हुए प्रत्याशी तो कर ही रहे हैं लेकिन अब तो उनके सुपुत्र भी इसमें कूद पड़े हैं, जो चुने हुए प्रतिनिधियों के अधिकारों के हनन के साथ ही उस जनादेश का भी अपमान है, जिसके बलबूते पर वे चुनकर आये है। आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) ने भी अपने 13 फरवरी के लेख में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। विधानसभा अध्यक्ष का यह फैसला स्वागत योग्य होने के साथ ही लोकतांत्रिक मूल्यों के सृजन के समान है लेकिन गृह जिले झुनझूनू के स्थानीय नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें देखने को मिल रही है, जो खुद को महिमान्वित कर रहे थे कि उनकी अनुशंसा से ही इन कामों की स्वीकृति मिली है। जिले में इस प्रकार के उद्धघाटन विवाद का विषय भी बन चुके थे कि भाजपा के ही नेता ने अपने नाम की पट्टिका लगाकर फीता काट दिया व दूसरे खेमे को नागवार गुजरा।
वासुदेव देवनानी का कैंची व रिबन संस्कृति पर लगाम लगाने वाले इस निर्णय का निश्चित रूप से स्वागत होना चाहिए।