भूतकाल को हम नहीं बदल सकते

AYUSH ANTIMA
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एक साहित्यकार के अनुसार जिस तरह से फूल को सूंघने पर ही उसकी महक को एहसास किया जा सकता है, न कि उसको याद करके या अनुमान लगाकर। उसी तरह जीवन की महक भी न आने वाले कल मे है और न ही बीते हुए कल मे, यह सिर्फ वर्तमान में ही ली जा सकती है। जो भूतकाल का रोना रोते रहते हैं, वे न तो वर्तमान को सुधार सकते है और न ही भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। जीवन को प्रगति के पथ पर निरंतर अग्रसर करने के लिए वर्तमान में पुरूषार्थ की आवश्यकता होती है। इस बात को ध्यान में रखना होगा कि बीता हुआ समय बदला नहीं जा सकता बल्कि वर्तमान की मेहनत के बल पर भविष्य को बदला जा सकता है। यदि देखा जाए तो भूतकाल अनुभवों का भंडार होता है। यदि हम उसी में उलझे रहे तो यह समय की बर्बादी के सिवाय कुछ भी नहीं है और इसी कारण हम अपने वर्तमान व भविष्य को नहीं संवार सकते हैं। भूतकाल की सुदृढ़ नींव पर वर्तमान के प्रयासों से ही हम भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। यदि उपरोक्त प्रसंग को सामाजिक परिपेक्ष्य में देखे तो अर्थ की अंधी दौड़ में उलझी युवा पीढ़ी दिशाहीन व विचारों से भ्रमित होकर अपने पूर्वजों को दोषारोपण करता है कि आखिर उन्होंने उसके लिए क्या किया लेकिन वह उन परिस्थितियों पर ध्यान नहीं देते कि उसके पूर्वजों ने सीमित साधनों के होते हुए उसे इस लायक बनाया कि वह समाज में प्रतिष्ठा पा सके। आज की युवा पीढ़ी को सोचना होगा कि जो बोया है वहीं काटना होगा। जो विचार उसके पूर्वजों के प्रति आज है वह शायद कल का भविष्य भी होगा और आने वाली पीढ़ी से यही सुनने को मिले। इसलिए युवा पीढ़ी को भूतकाल को कोसने के बजाय सुखद भविष्य के लिए वर्तमान समस्याओं के लिए मेहनत और उसी के अनुरूप योजना यानी प्लानिंग जरुरी है। इस बात को समझना होगा कि बीती बातों को भुलाकर, गलतियों से सीख लेकर वर्तमान में कर्मठता से काम करने वाले ही सफल होते हैं। परेशानियो पर रोने के बजाय उनसे सीख लेकर वर्तमान की आपदाओं से निपटने के लिए उपलब्ध साधनों का उपयोग करना ही समझदारी है। भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह, अजात शत्रु अटल जी ने लोकसभा में कहा था कि देश में पिछले पचास सालों के विकास को नकारा नहीं जा सकता, यदि कोई उसको नकार रहा है तो वह देश के पुरूषार्थ को नकार रहा है। उन्होंने कभी भूतकाल का रोना नहीं रोया, केवल वर्तमान में योजना बनाकर भविष्य के विश्व गुरू भारत के निर्माण के बारे में ही सोचा लेकिन अब राजनीति में इतना छिछोरापन आ गया है कि भविष्य का रोना रोकर देश के महापुरुषों के बारे मे अनर्गल बातें सुनने को मिलती है। राजस्थान की बात करें तो डबल इंजन सरकार अपने मुख्य इंजन की परिपाटी का अनुसरण करते हुए केवल निवर्तमान सरकार के बारे में ही बखान करती रहती है व इसी में शायद पांच साल का समय निकालने की सोच रही है।‌ वर्तमान व कल के भविष्य के सपने दिखाने के बजाय 2047 के सपने दिखाए जा रहे हैं। वाट्सएप विश्वविद्यालय के जरिए ऐसा पाठ्यक्रम परोसा जा रहा है कि जैसे विकास के कंगूरे पिछले दशक से ही देखने को मिल रहे हैं।

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