तहसील मुख्यालय के निवाई नगर पालिका क्षेत्र में इन दिनों बेशकीमती सरकारी जमीनों की बंदरबांट का एक ऐसा 'गंदा खेल' चल रहा है, जिसने प्रशासन की ईमानदारी और सिस्टम की पारदर्शिता पर कालिख पोत दी है। ताज़ा मामला नवगठित वार्ड संख्या 17 और 37 का है, जहाँ चरागाह, सिवायचक और बेशकीमती सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों की फसल लहलहा रही है।
*करोड़ों की 'चांदी' और रसूखदारों की 'शह'*
जानकारी के अनुसार, भू-माफियाओं का एक संगठित गिरोह पर्दे के पीछे रहकर सरकारी तंत्र और राजनेताओं की आंखों में धूल झोंक रहा है। यहाँ न केवल अवैध कॉलोनियां काटी जा रही हैं, बल्कि भोले-भाले खरीदारों को फंसाने के लिए सरकारी सुविधाओं (बिजली, पानी, सड़क और रोड लाइट) का लालच देकर 'पक्के सबूत' तैयार किए जा रहे हैं। सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि इन अवैध कब्जों को वैधता दिलाने के लिए मतदाता सूचियों में नाम जुड़वाने तक का खेल धड़ल्ले से खेला जा रहा है।
*नला रोड: ₹1 लाख से ₹5 लाख में बिक रही सरकारी जमीन*
विद्युत विभाग और स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, नला रोड कच्ची बस्ती क्षेत्र में लगभग 1,000 प्लॉट सरकारी भूमि पर काटे गए हैं। माफिया प्रति प्लॉट 1 से 5 लाख रुपए वसूल कर चांदी कूट रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर वो 'अदृश्य हाथ' किसका है, जो इस पूरे सिंडिकेट को प्रशासनिक सुरक्षा प्रदान कर रहा है ?
*विद्युत विभाग: नियम ताक पर, 'जेब गर्म' तो कनेक्शन नरम*
भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि विद्युत विभाग ने भी सारे कायदे-कानून ताक पर रख दिए हैं। सूत्रों का दावा है कि सरकारी भूमि होने के बावजूद, मोटी रिश्वत के बदले धड़ल्ले से घरेलू विद्युत कनेक्शन जारी किए जा रहे हैं। जब जेबें गर्म होती हैं, तो विभाग की आंखों पर 'नियमों की पट्टी' बंध जाती है।
*जनता पूछ रही है तीखे सवाल*
* जब खुलेआम अवैध प्लाटिंग हो रही थी, तब नगर पालिका और राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारी कहाँ सो रहे थे ?
* अवैध जमीनों पर सरकारी खर्चे से सड़क और रोड लाइट की सुविधा देने की फाइलें किसने पास कीं ?
* क्या प्रशासन केवल गरीब का आशियाना उजाड़ने के लिए 'पीला पंजा' सुरक्षित रखता है, या इन बड़े मगरमच्छों पर भी कोई कार्रवाई होगी ?
*निष्कर्ष:* निवाई की जनता अब इस 'महा-लूट' के पीछे के असली चेहरों को बेनकाब होते देखना चाहती है। यदि जिला प्रशासन और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने समय रहते इन सफेदपोश भू-माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों पर शिकंजा नहीं कसा, तो आने वाले समय में सरकारी संपत्तियों का नामोनिशान मिट जाएगा।
*संपर्क पोर्टल एवं जिला प्रशासन की सैकड़ो शिकायते*
नगर पालिका की जमीनो पे अवैध कब्जो को लेकर मोटी कमाई के चक्कर में आपसी विवाद के बाद गुटबाजी में बंटकर आपसी शिकायते करना शुरू कर दिया, जिसका परिणाम गुरुवार को नगर पालिका प्रशासन ने करीब 30 निर्माण कार्य तोड़ दिए, जिससे लोगों में भारी रोष व्याप्त है।
*विशेष खुलासा: निवाई में सरकारी जमीन की 'खूनी लूट' और सियासत का 'सफेदपोश' चेहरा*
क्या लोकतंत्र में कानून की किताब केवल गरीबों के लिए है ? निवाई नगर पालिका क्षेत्र में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों और भू-माफियाओं के जिस "मायाजाल" का पर्दाफाश हो रहा है, उसने प्रशासन से लेकर सत्ता के गलियारों तक हड़कंप मचा दिया है। सवाल यह है कि आखिर पर्दे के पीछे छिपा वो 'असली खिलाड़ी' कौन है, जिसके रसूख के आगे नगर पालिका प्रशासक, ईओ और समूचा प्रशासनिक अमला नतमस्तक है ?
*भोली जनता की क्या गलती*
आज सबसे बड़ा सवाल उन मासूम खरीदारों का है, जिन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई देकर इन अवैध कॉलोनियों में प्लॉट खरीदे। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने सिस्टम पर भरोसा किया लेकिन असली गुनहगार तो वो भू-माफिया हैं, जो रसूख के दम पर करोड़ों की 'चांदी' कूट रहे हैं और प्रशासन की आंखों में धूल झोंक रहे हैं।
*नगर पालिका की 'मेहरबानी': 2 महीने में 800 खंभे और सड़कों का जाल*
भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा देखिए—जिस कच्ची बस्ती को 'अवैध' कहा जाना चाहिए था, वहां महज दो महीनों के भीतर 800 बिजली के खंभे गाड़ दिए गए। इतना ही नहीं, नगर पालिका ने वहां सड़कों का जाल बिछा दिया और रोड लाइटें लगा दीं, जो 24 घंटे जलती रहती हैं। सरकारी धन का ऐसा दुरुपयोग बिना किसी बड़े 'आशीर्वाद' के संभव नहीं है।
*चर्चाओं के केंद्र में निर्वतमान पालिकाध्यक्ष: क्या है 'स्कूटी' और 'दौरे' का राज*
क्षेत्र में चर्चाएं गर्म हैं और लोग नाम न छापने की शर्त पर सीधे तौर पर निवर्तमान पालिकाध्यक्ष दिलीप ईसरानी की ओर इशारा कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि "चेयरमैन साहब जो कहते हैं, वो काम होकर रहता है।"
*सूर्योदय से पहले का 'चक्कर'*
चेयरमैन साहब प्रतिदिन सूर्योदय से पहले अपनी स्कूटी पर सवार होकर शहर के 40 वार्डों का चक्कर लगाते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। *अक्सर दौरे:* स्थानीय लोगों के अनुसार, वह अक्सर कुछ विशेष लोगों के साथ इस कच्ची बस्ती में नजर आते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या यह सक्रियता जनसेवा के लिए है या फिर इन अवैध बसवाटों को 'अभयदान' देने के लिए ?
*प्रशासनिक तंत्र की लाचारी या मिलीभगत*
जब शहर के मुखिया खुद सक्रिय हों और उनकी नाक के नीचे 800 खंभे लग जाएं, सड़कें बन जाएं और सरकारी जमीनें खुर्द-बुर्द हो जाएं, तो ईओ और अन्य कर्मचारियों की चुप्पी "मौन सहमति" की ओर इशारा करती है। आखिर किसके आदेश पर सरकारी खजाने से इन अवैध कॉलोनियों को सजाया जा रहा है ?
*जनता का सवाल:*
क्या जिला कलेक्टर महोदय इस "राजनीतिक और प्रशासनिक सांठ-गांठ" के गठजोड़ को तोड़ पाएंगे या फिर निवाई की बेशकीमती जमीनों को यूं ही रसूखदारों की भेंट चढ़ा दिया जाएगा ?