“खेजड़ी बचाओ – प्रकृति बचाओ” आंदोलन को लेकर लगभग 450–500 पर्यावरण प्रेमी पिछले तीन-चार दिनों से बीकानेर में महापड़ाव डाले हुए हैं। इस आंदोलन में साधु-संतों से लेकर किसान, महिलाएं और युवा समान रूप से शिरकत कर रहे हैं। खुले मैदान और सड़कों पर कठिन परिस्थितियों के बावजूद धरना स्थल पर मौजूद यह भीड़ अपनी आस्था और संकल्प की सजीव मिसाल बन चुकी है। सभी की एक ही पुरजोर मांग है कि खेजड़ी के पेड़ की अंधाधुंध कटाई किसी भी हालत में नहीं होनी चाहिए। विस्तारित होते आन्दोलन को देखते हुए सरकार ने एक सीमित क्षेत्र में इसकी कटाई पर प्रतिबंध की बात कहकर आन्दोलनकारियों के बीच एक संशय पैदा करने का काम किया है, जिससे आन्दोलनकारी विभाजित जरूर हुए हैं लेकिन पर्यावरण प्रेमी अपनी बात पर अडिग हैं। उनकी मांग सम्पूर्ण राज्य में प्रतिबंध लगाने की है।
यह आंदोलन केवल कुछ पेड़ों को बचाने की पहल नहीं है, बल्कि यह मरुप्रदेश की जीवन रेखा, लोक संस्कृति और आस्था की रक्षा का सामूहिक स्वर है। जब रेगिस्तान में जीवन की बात होती है, तो खेजड़ी अपने आप में एक संपूर्ण व्यवस्था के रूप में सामने आती है। यही कारण है कि यह संघर्ष किसी एक वर्ग तक सीमित न रहकर गांव-गांव तक फैलते हुए एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। खेजड़ी राजस्थान जैसे मरुप्रदेश में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पूजनीय वृक्ष माना जाता है। यह न केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालन का मजबूत आधार भी है। इसकी पत्तियां पशुओं को चारा देती हैं, फल (सांगरी ) सब्जी के रूप में उपयोगी हैं और इसकी जड़ें मिट्टी को बांधकर मरुस्थलीकरण को रोकती हैं। सूखे और अकाल के समय खेजड़ी ही वह भरोसा रही है, जिसने जीवन को थामे रखा और उम्मीद की छाया दी।
विशेषकर बिश्नोई समाज तो इसकी कटाई के खिलाफ अपने प्राणों की बाज़ी तक लगाने को सदैव तैयार रहा है। इतिहास में खेजड़ी की रक्षा के लिए दिया गया बलिदान केवल एक घटना नहीं, बल्कि प्रकृति-प्रेम की जीवित और प्रेरक परंपरा है। ऐसे समाज की भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर यदि विकास के नाम पर देववृक्ष पर कुल्हाड़ी चलाई जाती है, तो यह केवल नीति की नहीं, संवेदना की भी हार होगी। पर्यावरण के साथ-साथ खेजड़ी का पेड़ गहरी आस्था से जुड़ा हुआ विषय है, लोक देवताओं, धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक परंपराओं में खेजड़ी का विशेष स्थान है। गांवों में इसे केवल पेड़ नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह देखा जाता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में खेजड़ी को देववृक्ष तथा कल्पवृक्ष के नाम से भी पुकारा जाता है, इसलिए इसकी कटाई जनभावनाओं एवं सांस्कृतिक जड़ों पर एक प्रहार है। राज्य के कल्पवृक्ष खेजड़ी को समुचित संरक्षण दिया जाये, यह केवल मांग नहीं बल्कि सरकार और समाज दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है। आन्दोलन के मध्यनज़र सरकार ने बीकानेर एवं जोधपुर जिले में इसकी कटाई पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है। खेजड़ी चूंकि राज्य का प्रमुख पेड़ है, इसलिए सिर्फ एक सीमित क्षेत्र पर इसकी कटाई पर प्रतिबंध लगाना न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता। विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति और आस्था दोनों को रौंद दे, स्वीकार्य नहीं हो सकता। खेजड़ी को बचाना केवल पर्यावरण बचाना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और मरु संस्कृति की आत्मा को सुरक्षित रखना है। अतःआज़ कल्पवृक्ष खेजड़ी पर वार की नहीं-- पूरे राज्य में संरक्षण की जरूरत है।