क्या भारतीय राजनीति सिध्दांत विहीन हो गई

AYUSH ANTIMA
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भारतीय राजनीति में वैचारिक दृढ़ता की कमी, अवसरवादिता और नैतिकता के पतन के कारण सिद्धान्त विहीन हो‌ गई है। भ्रष्टाचार, चुनाव जीतने के लिए बेमेल गठजोड़, परिवारवाद और विचार विमर्श का व्यक्तिगत केन्द्रित होना इसके मुख्य कारण है। पारम्परिक और सामूहिक निर्णय वाली विचारधारा का महत्व कम हुआ है और राजनीति व्यक्तित्व केन्द्रित हो गई है।‌ सत्ता के मोह के चलते अवसरवादिता गठबन्धन होते हैं। कुर्सी के मोह मे सिध्दांतों को तिलांजली देकर विपरीत विचारधारा वाले राजनीतिक दलों का गठजोड़ भी देखने को मिलता है।‌ इसके साथ ही भ्रष्टाचार, अक्षमता और जवाबदेही की कमी के कारण राजनीतिक दलों से जनता ऊब सी गई है। यदि कहा जाए कि वर्तमान समय में राजनीतिक सिध्दांत दर्शन की दृष्टि से बांझपन का शिकार हो गई है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। देखा जाए तो निति आधारित राजनीति जगह की परिवारिक वर्चस्व और भ्रष्ट आचरण ने ले ली है। नितिगत बहस के बजाय धर्म, जाति और रेवड़ी संस्कृति पर चुनावी रणनीति केन्द्रित हो गई है। भारतीय राजनीति में संस्कारों और नैतिक मूल्यों का पतन, भ्रष्टाचार, अपराधीकरण, बाहुबलि, विचारधाराओं के संकट और संसदीय मर्यादाओ के क्षरण के कारण राजनीतिक स्तर निम्न स्तर पर पहुंचना चिंता का विषय है। दलीय स्वार्थ, नफरत भरी बयानबाजी और संस्थागत जबाबदेही में कभी के कारण लोकतंत्र को तानाशाही और सता के खेल में बदल दिया है। संसद व विधानसभाओं में बहस की गुणवत्ता कम हुई है और व्यवधान, हंगामा और अभद्र भाषा आम बात हो गई है। अब यदि उपरोक्त सिध्दांतों की दृष्टि से आधुनिक परिवेश में देखे तो निश्चित रूप से भारतीय राजनीति संक्रमण काल से गुजर रही है। नेता कुर्सी व सता से बंधे रहना चाहते हैं और जब सता परिवर्तन होता है तो घर वापसी का बहाना बनाकर सत्ता के चिपके रहना ही उनका सिध्दांत हो गया है। सामूहिक फैसलों की बात करें तो एक संस्था आलाकमान आता है, जिसका आज तक पता नहीं कि आलाकमान किस चिडिया का नाम है। चुने हुए विधायक अपने नेता का चुनाव नहीं कर सकते जिस नेता का आलाकमान से फरमान आता है, वही राज्य की कमान संभालने के लिए उपयुक्त होता है। चुनावो में धनबल व बाहुबल का बोलबाला होने के कारण भले आदमी राजनीति में आने से कतराते हैं। देखा जाए तो भ्रष्टाचार की जड़ ही टिकट पाने के लिए खर्च करना व चुनावी खर्च है। सत्ता अब सेवा का खेल न होकर व्यापार व उद्योग हो गया है। अच्छे रिटर्न की आशा में इस उधोग में निवेश किया जाता है।

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