आत्म कल्याण व परमात्म प्राप्ति के लिए आत्मा की समझ पैदा करें खरतरगच्छाधिपति

AYUSH ANTIMA
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बीकानेर: खरतरगच्छाधिपति, आचार्यश्री श्री जिनमणिप्रभ सूरिश्वरजी महाराज, गणिवर्य मयंक प्रभ सागर, मेहुल प्रभ सागर, मुनि मंथन प्रभ सागर, बालमुनि मीत प्रभ सागर, साध्वी दीपमाला व शंखनिधि ने मंगलवार को नाल गांव की कुशलदादा गुरुदेव की दादाबाड़ी में दर्शन वंदन करते हुए फलौदी, सेतरावा व जैसलमेर के लिए विहार किया। खरतरगच्छ युवा परिषद, खरतरगच्छ महिला परिषद, व बाल वाटिका के बालक-बालिकाओं के साथ नाल, बीकानेर, गंगाशहर के श्रावक-श्राविकाओं ने उनके साथ पैदल चलकर विदा किया। अपने चातुर्मास 2017 के बाद 8 वषों के बाद बीकानेर आए खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिन मणिप्रभ सूरिश्वरजी आदिठाणा गंगाशहर के 177 वर्ष प्राचीन श्री सांवलिया पार्श्वनाथ भगवान (गोल मंदिर) में जिन बिम्बो, देव-देवताओं तथा गुरु प्रतिमा के प्रतिष्ठा महोत्सव में सान्निध्य प्रदान किया। भव्य मंदिर का नव निर्माण व जीर्णोंद्धार का कार्य भगवान श्री पार्श्वनाथ मंदिर जीर्णोंद्धार ट्रस्ट व सेठ श्री फौजराज बांठिया पार्श्वनाथ जैन मंदिर ट्रस्ट गंगाशहर, बीकानेर ने करवाया। खरतरगच्छाधिपति, आचार्यश्री श्री जिनमणिप्रभ सूरिश्वरजी महाराज ने विहार के समय देशना में कहा कि जीवन छोटा व महत्वपूर्ण है। इस चौरासी लाख जीव योनियों में मनुष्य जीवन में हम आत्मा के कल्याण का पुरुषार्थ कर सकते है। धर्म की आराधना व आत्मा की साधना में अपने समय, प्रतिभा व पुरुषार्थ को आत्मा के कल्याण में लगाना है। शरीर की सुविधा के लिए अनेक जन्म है लेकिन आत्म कल्याण के लिए केवल मनुष्य शरीर ही है। आत्मा, अजर अमर है वह कल भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी। आत्म व परमात्म स्वरूप सदा रहता है व शरीर बदलता है। हम सांसारिक विषय भोग की चीजों को एकत्रित करने में लगे है जो हमारे साथ नहीं चलेगी। हम उन चीजों का संग्रह करना चाहिए जो हमारे जन्म जन्मातर तक साथ चलेगी। आत्मा व हमारे अपने कर्म हमारे साथ चलेगें। आत्म-परमात्म की साधना व अच्छें कर्म करें, जिससे अच्छा भविष्य व परिणाम मिलेगा। उन्होंने कहा कि परमात्मा म्हावीर की देशना कहती है कि अपनी आत्मा को समझों। भगवान महावीर किसी जातिवाद में विश्वास नहीं करते, वे कहते सभी जातियां हमारे बनाई हुई। सभी की एक जाति है मनुष्य व उसमें मनुष्यता। तत्वार्थ सूत्र में कहा कि सभी मनुष्य परस्पर प्रेम व सद्भाव से रहे। स्वयं अपनी आत्मा का कल्याण करें तथा दूसरों को भी आत्म कल्याण के लिए प्रेरित करें। सभी एक दूसरे के लिए उपकारी बनें। उपकार लेना है व आनंद भाव से उपकार करना है। हम किसी भी धर्म सम्प्रदाय के क्यों न हो आत्म कल्याण व परमात्म प्राप्ति के लिए परम शांति, समृद्धि तथा चिर आनंद के लिए अपनी आत्मा में समझ पैदा करनी है l

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