हमारे तुम ही हो रखपाल। तुम बिन और नहीं को मेरे, भव दुख मेटणहार॥ वैरी पंच निमष नहिं न्यारे, रोक रहे जम काल। हा जगदीश दास दुख पावे, स्वामी करहूँ सँभाल॥ तुम बिन राम दहैं ये द्वन्द्वर, दशों दिश सब साल। देखत दीन दुखी क्यों कीजे, तुम हो दीन दयाल॥ निर्भय नाम हेत हरि दीजे, दर्शन परसन लाल। दादू दीन लीन कर लीजे, मेटहु सब जंजाल॥ अर्थात हे भगवान् ! आप ही इस संसार के सब दुःखों को मिटाने वाले और रक्षक आप जैसा दूसरा कोई भी नहीं है। काम, क्रोध आदि शत्रु शब्द, स्पर्श, आदि पांचों इन्दियों के विषय क्षण भर भी मुझे नहीं छोड़ते और आप की तरफ आने में बाधक हैं तथा नरक में डाल देते हैं। वहां पर मुझे नरकयातना भोगनी पड़ती है। ज्यादा क्या कहूं। ये सब आपत्तियों के घर हैं। हा जगदीश ! मैं आपका दास हूं। इन दुःखों से दुःखित की रक्षा कीजिये। आपके दर्शनों के बिना शोक, मोह आदि द्वन्द्व चारों दिशाओं में पीड़ा दे रहे हैं। आप तो दयालु हैं फिर मुझे दुःखी देखकर भी अधिक दुःखी क्यों कर रहे हैं। हे भगवान् ! आप अपना नाम, दर्शन और स्पर्श, प्रदान करके मुझे निर्भय और सुखी बना दीजिये। बस, दुःखों के जालों को नष्ट करके अपने स्वरूप में लीन कर दो। तब ही मैं अपने जीवन को जीवन मानूंगा, नहीं तो भारभूत ही है। वास्तव में वही जीवन उत्तम जीवन है। जिसमें अवश्य पाने योग्य परमात्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिस से फिर शोक नहीं करना पड़ता तथा जो परम निर्वाण रूप सुख का स्थान है। यों तो पेड़ पौधे भी जीते हैं, पशु और पक्षी भी जीवित रहते हैं। वास्तव में उसी पुरुष का जीवन सफल है, जिसका मन उन्मनीभाव को प्राप्त हो जाय॥इस संसार में उसी का पैदा होना अच्छा है जो भक्तिमय जीवन यापन करता है, जिससे फिर जन्म न हो।
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