धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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पीव तैं अपने काज संवारे। कोई दुष्ट दीन को मारन, सोइ गहि तैं मारे। मेरु समान ताप तन व्यापै, सहजै ही सो टारे। सन्तन को सुखदाई माधो, बिन पावक फंद जारे।। तुम थै होइ सबै विधि समथ, आगम सबै विचारे। सन्त उबार दुष्ट दुख दीन्हा, अन्ध कूप में डारे॥ ऐसा है शिर खसम हमारे, तुम जीते खल हारे। दादू सौं ऐसे निर्वहिये, प्रेम प्रीति
पिव प्यारे॥ अर्थात जगत् पालन का कार्य भगवान् की कृपा से सदा चलता ही रहता है। भगवान् के प्रिय भक्तों को कोई कष्ट देता है तो भगवान् स्वयं उस की रक्षा करते हैं तथा दुष्ट को दण्ड देते हैं। भक्त का यदि सुमेरु तुल्य भी दुःख हो तो भगवान् अनायास ही उसको मिटा देते हैं। हे माधव ! आपको भक्त बहुत ही प्रिय लगते हैं। अत: आप उनको सदा सुख देते रहते हैं। भक्तों के कल्याण में जो बाधक कर्मजाल हैं, वे तो भगवान् की कृपा कटाक्ष से स्वयं ही निवृत्त हो जाते है। हे सर्वसमर्थ परमात्मन् ! आप तो सब का हित चाहने वाले हैं, तो फिर भक्त के हित के विषय में क्या कहना है। उनका तो अवश्य हित होगा ही और कार्य सिद्धि भी हो जाती है। आपका अवतार दुष्टों के वध के लिये और भक्तों की रक्षा के लिये ही माना गया है। अत: आप भक्तों की रक्षा और दुष्ट को दण्ड देते ही रहते हैं। आपके बल के आगे दुष्ट हारते हैं और आप की ही विजय होती है। हे मेरे परम प्रिय भगवान् ! मेरे प्रेम को देखते हुए आप मेरी सदा ही रक्षा करते रहना, यह ही मेरी प्रार्थना है।
श्रीमद्भगवतगीता में कहा है कि-यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे। जब-जब धर्म की हानि व अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं। अर्थात् साकार रूप से प्रकट होता हूं। साधु पुरुषों का उद्धार करने और दुष्टों के विनाश के लिये तथा धर्म की स्थापना के लिये युग-युग में मैं प्रकट होता रहता हूं।

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