भाजपा के खलनायक धर्मेंद्र प्रधान

AYUSH ANTIMA
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ऐसे तो यह भारत के लोकतंत्र की शोभा है कि अनपढ़ नेता शिक्षा मंत्री बन जाता है व दसवीं में चार बार फेल हो जाने पर वह व्यक्ति स्कूल, कालेज व कोचिग संस्थान का संचालन शुरू कर देता है। शिक्षा वह प्रकाश है, जो किसी भी समाज में फैले अंधेरे को भगाने में सहायक होता है। किसी भी देश का भविष्य उसकी शिक्षा निति व प्रणाली पर निर्भर करता है लेकिन राजनीतिक दलों ने देश का बेडा ग़र्क करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भाजपा के शिक्षा मंत्री भाजपा के लिए खलनायक का काम कर रहे हैं।‌ एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर एक चैप्टर सम्मिलित किया गया। इस चैप्टर में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर पढाया जाना था। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इसका स्वत: संज्ञान लिया व इसके उपर सुनवाई होनी है, इस बीच एनसीईआरटी ने खेद प्रकट करते हुए चैप्टर को हटाने का निर्णय लिया व कहा कि उसका न्यायपालिका के प्रति पूरा सम्मान है। उसने कहा कि पाठ्यक्रम का उद्देश्य संवैधानिक संस्थाओं के बारे में जागरूक करना था। इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि हम छात्रों को क्या पढ़ा रहे हैं, इसकी निगरानी कौन कर रहा है, उन्होंने इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की बात कही। अब सवाल उठता है कि शिक्षा मंत्री का यह दूसरा कारनामा है, इससे पहले यूजीसी का नया कानून लेकर आये थे, जिस पर देश में बवाल हो रहा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे लगाते हुए कठोर टिप्पणी की है लेकिन यूजीसी कानून को लेकर प्रधानमंत्री की चुप्पी संदेह पैदा करती है। जब एनसीईआरटी मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बयान तुरंत आ गया तो यूजीसी कानून को लेकर चुप्पी आखिर क्यों हैं, जबकि इस देश के सवर्ण समुदाय में इसको लेकर भारी रोष है व देश में इसको लेकर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं। यह देश के सवर्ण समुदाय का दुर्भाग्य है कि एक भी इस समुदाय के बड़े नेता या मंत्री ने इस कानून को लेकर एक शब्द भी नहीं कहा। एक तरफ भाजपा का मातृ संगठन अपने शताब्दी समारोह के अन्तर्गत देश में विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन करवाकर इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि देश में केवल एक ही जाति है कि हम हिन्दू हैं और दूसरी तरफ भाजपा सरकार यूजीसी कानून लागू कर जातिवाद को बढ़ावा देने के साथ ही सामाजिक समरसता व सामाजिक ढांचे को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा होने के साथ ही देश को जातिवाद के ज्वालामुखी पर खड़ा करने पर उतारु है। शिक्षा के पवित्र मंदिरों में जातिवाद का जहर घोलना अनुचित ही नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से अनुचित भी है।

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