NCRB डेटा एक डरावनी सच्चाई बताता है: आधी महिलाएं कभी वापस नहीं लौटतीं: साध्वी समदर्शी गिरि

AYUSH ANTIMA
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जयपुर (रविंद्र आर्य): भारत में महिलाओं और लड़कियों के लापता होने की घटनाएं अब किसी एक राज्य या प्रशासनिक विफलता तक सीमित नहीं हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के नवीनतम डेटा से साफ़ पता चलता है कि देश एक ऐसे संकट से गुज़र रहा है, जहाँ हर साल लाखों महिलाओं को "लापता" बताया जाता है, और उनमें से बड़ी संख्या में महिलाएं कभी घर वापस नहीं लौटतीं।
यह स्थिति सिर्फ़ कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक, नैतिक और मानवाधिकार संकट है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि "लापता" शब्द का प्रशासनिक इस्तेमाल असल अपराध की गंभीरता को कम कर देता है, जिससे तुरंत कार्रवाई और उच्च-स्तरीय जांच नहीं हो पाती है।

*राजस्थान की तस्वीर: आंकड़े झूठ नहीं बोलते*

आधिकारिक NCRB रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले कुछ सालों में राजस्थान में महिलाओं के लापता होने के हजारों मामले दर्ज किए गए हैं। अकेले 2023 में, राज्य में महिलाओं और लड़कियों के लापता होने के 36,000 से ज़्यादा नए मामले दर्ज किए गए। इनमें से ज़्यादातर किशोरियां और युवा महिलाएं हैं। अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक संख्या बहुत ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि सामाजिक दबाव, बदनामी के डर और पुलिस की उदासीनता के कारण बड़ी संख्या में परिवार रिपोर्ट दर्ज कराने तक नहीं पहुँच पाते हैं।

*"लापता" शब्द: अपराध को छिपाने का एक कवच*
सामाजिक विश्लेषकों के अनुसार, "लापता" शब्द अब एक प्रशासनिक कवच बन गया है जो—अपहरण के संदेह को कमज़ोर करता है। मानव तस्करी, ज़बरदस्ती शादी और संगठित नेटवर्क से जुड़े अपराधों को छिपाता है। अंतर्राष्ट्रीय और सीमा पार अपराधों की जांच को धीमा करता है। यही कारण है कि कई मामलों में, सालों बीत जाने के बाद भी पीड़ित महिलाओं का कोई सुराग नहीं मिलता। सामाजिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि "लापता" शब्द एक प्रशासनिक सुविधा बन गया है। इस शब्द का इस्तेमाल अपहरण के संदेह को कमज़ोर करता है। मानव तस्करी, ज़बरदस्ती शादी और लव जिहाद जैसे अपराधों को छिपाता है। अंतर-राज्यीय और सीमा पार अपराधों की जांच में बाधा डालता है, इसलिए, कई मामलों में, पीड़ित सालों बाद भी लापता रहते हैं।  

*साध्वी समदर्शी गिरि की सीधी चेतावनी*

इसी बैकग्राउंड में, राजस्थान शक्तिपीठ, श्री शक्तिपीठ जयपुर की साध्वी समदर्शी गिरि ने सरकार और पुलिस सिस्टम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि महिलाओं के गायब होने को सिर्फ़ गुमशुदगी का मामला मानना ​​राज्य की असंवेदनशीलता को दिखाता है।
साध्वी समदर्शी गिरि के शब्दों मे “जब कोई बेटी या महिला अचानक गायब हो जाती है, तो उसे सिर्फ़ गुमशुदगी का मामला कहना अपराध से समझौता करना है। अगर आरोपी का पता है, तो उनके खिलाफ़ किडनैपिंग की FIR दर्ज होनी चाहिए और अगर स्थिति साफ़ नहीं है, तो अज्ञात लोगों के खिलाफ़ किडनैपिंग का मामला दर्ज होना चाहिए। आधी महिलाएं कभी घर वापस नहीं आतीं। यह सिर्फ़ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि देश के लिए एक चेतावनी है।”
कीमती समय बर्बाद हो रहा है। साध्वी ने बताया कि मौजूदा सिस्टम में, पहले 24 से 48 घंटे, जो किसी भी सर्च ऑपरेशन के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं, फाइलों और प्रक्रियाओं में बर्बाद हो जाते हैं। इस दौरान, अपराधी पीड़ित को राज्य या देश की सीमाओं के पार ले जाने में कामयाब हो जाते हैं। कई विकसित देशों में, जैसे ही कोई महिला या नाबालिग गायब होती है, उसे संभावित अपहरण माना जाता है और सभी सुरक्षा एजेंसियां ​​एक्टिव हो जाती हैं, ट्रांसपोर्ट और बॉर्डर की निगरानी बढ़ा दी जाती है। डिजिटल और टेक्निकल सर्च तुरंत शुरू कर दी जाती है। इसके उलट, भारत में, ज़्यादातर मामले सालों तक "गुमशुदा लोगों के रजिस्टर" तक ही सीमित रहते हैं।

*सरकार से तीन साफ़ मांगें*

साध्वी समदर्शी गिरि ने सरकार के सामने तीन ठोस मांगें रखी हैं:
* जैसे ही कोई महिला या लड़की गायब होती है, किडनैपिंग के आरोप में अनिवार्य FIR दर्ज की जानी चाहिए।
* गुमशुदा महिलाओं को ढूंढने के लिए एक अलग राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय सर्च बजट बनाया जाना चाहिए।
* अपराध रिकॉर्ड सिस्टम में "गुमशुदा" के बजाय "संभावित अपहरण" की एक अलग कैटेगरी जोड़ी जानी चाहिए।

*राष्ट्रीय चेतावनी*

साध्वी समदर्शी गिरि ने साफ़ तौर पर कहा: "अगर आज सिस्टम नहीं बदला, तो कल हर घर से एक बहन गायब हो जाएगी और वह सरकारी फाइलों में सिर्फ़ एक नंबर बनकर रह जाएगी।" उनके अनुसार, यह मुद्दा सिर्फ़ महिलाओं की सुरक्षा का नहीं है, बल्कि यह सीधे भारत के सामाजिक ताने-बाने, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। NCRB का डेटा एक कड़वी सच्चाई बताता है:
महिलाएं लगातार गायब हो रही हैं लेकिन सहानुभूति और कार्रवाई लगातार कमज़ोर हो रही है। सवाल अब यह नहीं है कि महिलाएं क्यों गायब हो रही हैं, सवाल यह है कि क्या सरकार "लापता" शब्द का इस्तेमाल करने के बजाय "अपहरण" की सच्चाई को स्वीकार करने की हिम्मत दिखाएगी।

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