राम संभालिये रे, विषम दुहेली बार॥ मंझ समुद्रां नाव री रे वूड़े खेवट बाज। काढनहारा को नहीं, एक राम बिन आज॥ पार न पहुँचे राम बिन भेरा भव जल मांहि। तारणहारा एक तूं, दूजा कोई नाहि॥ पार परोहन तो चले, तु खेवहु, सिरजनहार।
भव सागर में डूब है तुम बिन प्राण अधार॥ औघट दरिया क्यों तिरै वोहिथ बैसणहार। दादू खेवट राम बिन कौन उतारे पार॥ अर्थात हे राम ! यह समय बड़ा भयंकर है, संकट का समय है, थोड़ा ध्यान देकर देखो। यह जीवन-नौका संसार-सागर के मध्य कर्णधार के बिना डूबी जा रही है। राम के बिना इस जीवन-नौका की रक्षा करने वाला और कोई नहीं दिखता, जो डूबती हुई की रक्षा कर सके। यह जीवन-नौका संसार समुद्र के विषय-जल में पूर्णत: डूब चुकी, अत: आपके बिना इसका उद्धार करने वाला कोई नहीं- देख रहा हूँ। आप ही पार करने वाले हैं, दूसरा कोई तारने वाला नहीं है। हे सृष्टि के बनाने वाले परमात्मन् ! यदि आप इस जीवन- नौका को पार करना चाहो तो पार लगा सकते हो, अन्यथा नहीं। हे प्राणाधार !आपके बिना यह जीवन-नौका अवश्य ही संसार-समुद्र में डूबेगी। कारण कि यह संसार बड़ा ही दुस्तर है, कैसे पार किया जा सकता है। यह जीवन-नौका संसार के विषय-जल में डूबने के सम्मुख आ गई है। अत: हे संसार- सागर को पार करने वाले परमात्मन् ! इसको पार लगा दो, कृपा करके। श्रीमद्भागवत में लिखा है कि-आपकी कृपा की प्रतीक्षा करते हुए और अपने कर्म फलों को भोगते हुए जो जीवन निर्वाह करते हैं और जो हृदय-वाणी-शरीर से भगवान को नमस्कार करते हुए जीते हैं, उनकी मुक्ति सुलभ हो जाती है।