राजस्थानी का मुद्दा नकारखाने में तूती की आवाज: पीबीएम में भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी

AYUSH ANTIMA
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बीकानेर: विधायक जेठानंद व्यास और देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिशना राम सियाग अभी दोनों चर्चा में है। पीबीएम में बोलकर व्यास कइयों की किरकिरी बन गए हैं। वहीं राजस्थानी भाषा को मान्यता का मुद्दा उठाकर सियाग भाषा प्रेमियों के चहेते। विधायक ने पीबीएम में चल रहे भ्रष्टाचार को चुनौती देने का साहस किया है। यह उनके श्रेष्ठ जन प्रतिनिधि होने का प्रमाण है। नहीं तो कितने ही नेता इस भ्रष्टाचार के हिस्सेदार बने हुए हैं। यह कोई ऐसा तथ्य नहीं है, जो आज ही उजागर हुआ हो। वसुन्धरा राजे के शासन काल में तत्कालीन अतिरिक्त संभागीय आयुक्त ने बाकायदा एक प्रशिक्षु आईएएस की देखरेख में जांच अभियान चलाकर पीबीएम अस्पताल में चल रहे कॉकस का भंडाफोड किया था। इसकी विस्तृत जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री को भेजी थी, जिसमें लपके किस तरह बीमारों को प्राइवेट अस्पतालों में भेजकर कमीशन कमाते हैं। डॉक्टर कैसे मिलीभगत से अपना धंधा पनपाते है, खरीद में कैसे कंपनियों को फायदा पहुंचाया जाता है और कमीशन बटोरा जाता है। नेताओं का किस तरह मेडिकल व्यवसाय पनपाया जाता है, ऐसे कई तरह के भ्रष्टाचार का उल्लेख था। पूरी रिपोर्ट दस्तावजों के साथ सरकार को भेजी गई, हुआ कुछ नहीं लीपा पोती के सिवाय, क्योंकि यह भ्रष्टाचार व्यवस्था की जड़ में समाया हुआ है। विधायक ने उजागर किया है तो कोई पीछे से शह देने वाले भी मौजूद है। बात बनेगी नहीं। यह तथ्य सार्वजनिक है कि ठेकदार तय से कम सफाई और सुरक्षा कर्मचारी रखता है। कमीशन का धंधा आज का नहीं है, हर राज में चलता आ रहा है। विधायक ने जो भी तथ्य उजाकर किए हैं, वो सच है। संविदा कर्मियों से अवैध वसूली, नौकरी दिलाने के नाम पर रकम की मांग, 500 की नियुक्ति बताकर 200 कार्यरत, भर्ती प्रक्रिया में घोटाला, जनता क्लिनिक कार्मिकों से 500 से 1000 नियमित वसूली के आरोपों की बात सार्वजनिक है। यह सच अनेकों बार अलग अलग माध्यम से उजागर होते रहते हैं। अंततोगत्वा लीपापोती के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते है। जनता अव्यवस्था भुगतती रहती है। भ्रष्टाचार व्यवस्था में साथ साथ चलता रहा है, यह कोई नई बात नहीं है, फिर भी विधायक ने यह साहस किया है तो प्रशंसा के पात्र है। ऐसे ही कांग्रेस देहात जिलाध्यक्ष बिशना राम सियाग ने भले ही राजस्थानी भाषा के संवैधानिक मान्यता का मुद्दा फिर से उठाया, कुछ हो पाना मुश्किल है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने और राजस्थान के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर राजस्थानी की दूसरी राज भाषा घोषित करने की मांग रखी है। हालांकि 2013 से राजस्थानी भाषा को मान्यता देने का राजस्थान विधानसभा में सर्वसहमति से पारित प्रस्ताव केंद्र सरकार के समक्ष विचारार्थ है। बीकानेर देहात कांग्रेस अध्यक्ष ने मुद्दे पर ध्यान आकृष्ट किया है, यह बात प्रशंसनीय है। राजस्थानी भाषा की मान्यता का मुद्दा आजादी के बाद से कई आंदोलनों से सरकारों के सामने आता रहा है। वर्तमान केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने भी सांसद रहते हुए राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का ईमानदार प्रयास किया था। एकबारगी आस बंधी थी कि आठवीं अनुसूची में शामिल हो जाएगी, हुआ कुछ नहीं। इस मुद्दे पर आए दिन राजस्थानी के हिमायती साहित्यकारों, भाषाविदों, संस्थाओं और राजनीतिक दलों के मंचों से आवाज उठती रहती है। बड़े बड़े आश्वासनों और आंदोलनों के बावजूद केंद्र को भेजे प्रस्ताव पर विचार नहीं हुआ है। ऐसे में इस मुद्दे पर कांग्रेस के आंदोलन की बात नकारखाने में तूती की आवाज मात्र ही है।

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