परम कथा उस एक की, दूजा नाही आन। दादू तन मन लाइ करि, सदा सुरति रसपान। अर्थ: संत श्री दादूदयाल जी महाराज कहते है कि महात्माओं के सत्संग में प्रायः भगवान की ही मुख्य चर्चा हुआ करती है न कि राजकथा और जगत कथा। अतः साधु समागम से अपने मन बुद्धि को निगृहीत करके भगवत्कथा रस का ही साधक को पान करना चाहिए। श्री मदभागवत में लिखा है कि इस संसार में भ्रमण करते हुए जीव को जब भगवत्प्रेमी भक्तों का समागम प्राप्त होता है तब ही सत्संगति से प्राप्त होती है। सत्संगति से उसी समय सद्गति तथा परावर परमात्मा में बुद्धि लग जाती है। जड़भरत वाक्यम: है रहूगण ! सत्पुरुषों के चरणों की रज से अपने को स्नान कराये बिना, तप, यज्ञ, वैदिक कर्म, अन्न का दान, अतिथि, सेवा, दीन सेवा, जल, अग्नि या सूर्य की उपासना किसी भी साधन से परमात्मा का ज्ञान प्राप्त नहीं होता। कारण ये है कि महापुरुषों के समीप सदा पवित्र कीर्ति श्री हरि के गुणानुवाद चलते रहते हैं।
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