महेन्द्र जीत सिंह मालवीय पर एसीबी की कार्रवा

AYUSH ANTIMA
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चार बार के विधायक, एक बार के सांसद व दो बार राजस्थान सरकार में मंत्री रह चुके महेन्द्र जीत सिंह मालवीय के कांग्रेस में जाने की घोषणा के साथ ही एसीबी ने मालवीय के पेट्रोल पंप व क्रेशर प्लांट पर छापेमारी की है। हालांकि कांग्रेस की तरफ से घर वापसी की अधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मालवीय पर छापेमारी भाजपा नेताओं के इशारे पर हुई है क्योंकि मालवीय ने दो दिन पहले ही कांग्रेस में घर वापसी के संकेत दे दिए थे। विदित हो एसीबी गृह विभाग के अधीन आती है और मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के पास गृह विभाग भी है। इस छापेमारी को लेकर मालवीय का बयान आया है कि यह उन पर दबाव बनाने की राजनीति है क्योंकि आगामी पंचायत चुनावों में इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। उन्होंने भाजपा से अपना त्यागपत्र प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ को भिजवा दिया है कि भाजपा में उनका दम घुटने लगा है। अब यह तो एसीबी के खुलासे से ही पता चलेगा कि छापेमारी की कार्रवाई में क्या हासिल हुआ है। आदिवासियों में उनके जनाधार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चार बार विधायक व एक बार सांसद रह चुके हैं। हालांकि लोकसभा चुनावो में इस बार भाजपा के टिकट से चुनाव नहीं जीत पाए थे। वर्तमान में उनकी पत्नी डूंगरपुर की जिला प्रमुख हैं। अब यदि मालवीय पर एसीबी छापेमारी का पोस्टमार्टम करें तो निश्चित रुप से इसे राजनीतिक द्वेषपूर्ण कारवाई कहा जा सकता है क्योंकि छापेमारी की टाइमिंग को लेकर इस तरह की शंका व्यक्त की जा रही है कि जब तक मालवीय भाजपा की शोभा बढ़ा रहे थे। बिल्कुल ईमानदार व पाक साफ थे और भाजपा छोड़ने के दो दिन बाद ही बेईमानी का आवरण ओढ़ लिया। ऐसे बहुत से नेता हैं, जिन पर भाजपा भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाती रही थी लेकिन ज्यों ही भाजपा की सदस्यता ग्रहण की उनकी वाशिंग मशीन से बिल्कुल पाक साफ हो गये। भारतीय राजनीति की काली कोठरी में कोई भी उजला नेता आधुनिक परिवेश में नहीं मिलेगा। इस काली कोठरी में कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की कालिख मिल ही जाएगी, फिर केवल विपक्ष के नेताओं पर ही ईडी, एसीबी जैसी कारवाई आखिर क्यों होती है। क्या भाजपा ही ऐसा राजनीतिक दल है, जिसके नेता ईमानदारी की मूर्ति है। विदित हो एक स्टिंग ऑपरेशन में भाजपा के विधायक को विधायक निधि की अनुशंसा के एवज में कमीशन लेने के आरोप लगे थे लेकिन भाजपा उस विधायक को बचाने में लगी है व प्रदेश नेतृत्व भी विधायक के बचाव में उतर आये है। यदि चुनावों में हराने की ताकत किसी राजनीतिक दल में नहीं है तो ऐसी कारवाई कर उस नेता की राजनीतिक हत्या करने में गुरेज नहीं करते।

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