सुख दुख सब झांई पडे, तब लग काचा मन। दादू कुछ व्यापै नही, तब मन भया रतन।। संत शिरोमणि महर्षि श्रीदादूदयालजी महाराज कहते हैं कि जब तक मन में सुख दुःख की प्रतीति होती है तब तक मन कच्चा ही हैं क्योंकि वासनवाला होने से और जब सुख दुःखातीत हो जाता है, तब यह मन रत्न की तरह शुद्ध होकर ब्रह्म की तरह हो जाता है।
गीता में कहा है कि पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस मनुष्य को सुख दुख आदि व्यथित नहीं कर सकते तो वह समान सुख-दुख वाला मनुष्य धीर होता हुआ मोक्ष के योग्य हो जाता है। विवेकचूड़ामणि में लिखा है कि जैसे पुटपाक से संशोधित सुवर्ण अपने मल को त्यागकर अपने गुणों को धारण करता है, वैसे ही यह मन ब्रह्म के ध्यान से सत्व, रज, तम गुणों को त्यागकर सम भाव को प्राप्त हो जाता हैं। निरंतर अभ्यास के कारण परिपक्व हुआ मन जब ब्रह्म में लीन हो जाता हैं, तब निर्विकल्प समाधि में अद्वितीय रस का अनुभव करता हैं।