देश की तमाम आकांक्षाओं के बीच देश वैश्विक परिस्थितियों से गुजर रहा है। पडौसी देशों के घटनाक्रम को भी शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। ऐसी परिस्थितियों में केवल सत्ता पक्ष ही नहीं बल्कि तमाम विपक्षी दलों को इन चुनौतियों का साझा रूप से सामना करने का दायित्व बनता है। हाथ पर पांच अंगुलियां होती है लेकिन जब मुठ्ठी का रूप धारण कर लेती है तो ताकत बन जाती है। इसी प्रकार हर राजनीतिक दल छोटा हो या बड़ा हो देश को सशक्त, शक्तिशाली व विकास में अपना योगदान देना चाहिए। सत्तारूढ़ दल को भी अहम की भावना का त्याग कर समय समय पर विपक्षी दलों से सार्थक संवाद करना चाहिए। सबका साथ, सबका प्रयास, सबका विकास व सबका विश्वास केवल नारों तक ही सिमित न रहे, इसको लेकर इच्छा शक्ति के साथ धरातल पर प्रयास करने होंगे। देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल कांग्रेस अपने अपरिपक्व नेतृत्व को ढोने को मजबूर हैं। कांग्रेस अभी भी गांधी के नाम इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। उनको लगता है कि बिना गांधी के नाम उनका कोई वजूद नहीं है। मनमोहन सिंह के उपर एक गांधी और अब मल्लिकार्जुन खड़गे के एक गांधी नाम का आलाकमान बैठा हुआ है। कांग्रेस में अनेक योग्य और राजनीतिक रूप से परिपक्व नेता हैं लेकिन गांधी परिवार इनको आगे बढ़ते देखना नही चाहते। देखा जाए तो गांधी एक उपनाम है, जो महात्मा गांधी ने इंदिरा गांधी के पति फिरोज को दिया था लेकिन कांग्रेस इसी नाम का दोहन कर राजनीतिक पिच पर खेलती रही। यदि देखा जाए तो कांग्रेस अपनी विचारधारा को छोड़ सत्ता की भूख में दिशाहीन हो गई। कांग्रेस के नेता विदेशों में जाकर भारतीय लोकतंत्र का मखौल उड़ाते हैं और संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्न चिन्ह खडे करते हैं। यह भी देखा गया है कि पक्ष हो या विपक्ष भाषाई सुचिता रसातल में चली गई है। संगठन में लचर कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन खोती जा रही है। संगठन के नाम पर सारे निर्णय प्रथम परिवार ही करता है। इसी पारिवारिक आलाकमान संस्कृति के चलते अनेक नेताओं ने चुप्पी साध ली या कांग्रेस का दामन छोड़ चुके हैं। इसी क्रम में छोटे दल भी पारिवारिक पृष्ठभूमि से बाहर नहीं निकल पाए हैं। राजनीतिक दलों को समझना होगा कि लोकतंत्रिक व्यवस्था और संघीय व्यवस्था तभी कायम रह सकती है, जब तक देश की संप्रभुता, सुरक्षा और सम्पन्नता अक्षुण्ण है। एक समय था जब देश की राजनीति की धुरी कांग्रेस सिस्टम के नाम से जानी जाती थी लेकिन आज देश भाजपा सिस्टम अपना चुका है। इस भाजपा सिस्टम से तभी मुकाबला किया जा सकता है, जब तक भारतीय राजनीति में प्रासांगिक बने रहे। इसके लिए सार्थक सोच, देश प्रेम की भावना, राष्ट्र सर्वोपरि को प्राथमिकता देने के साथ गांधी का जो आवरण ओढ़ रखा है, उसे उतारना होगा। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्ता अंको का खेल होता है, इसलिए किसी भी राजनीतिक दल को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि सत्ता उनकी बपौती है। अपनी हार को पचाकर जिम्मेदार अच्छे विपक्ष का व्यवहार करना होगा, जैसा कि कांग्रेस ने मानस पटल पर अंकित कर रखा है, गांधी की आड़ में सत्ता हथिया लेंगे। देश का कोई भी दल हो, जब तक देश की एकता व अखंडता कायम रहेगी, उनकी राजनीति चलेगी। अतः देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करें और जनता के बीच ऐसे काम करें कि जनता उनको सर आंखों पर बैठाए।
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