खेल से संस्कार, नशे से दूरीस्वस्थ भारत की ओर बढ़ता एक सशक्त कदमनिशा लिम्बा

AYUSH ANTIMA
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खिलाड़ी एवं बास्केटबॉल कोच
सचिव, जिला नेटबॉल संघ, बीकानेर 

आज का भारत युवाओं का देश है, लेकिन यह भी सच है कि तेजी से बदलती जीवनशैली, मोबाइल और स्क्रीन पर बढ़ती निर्भरता, तथा नशे की ओर आकर्षण ने बच्चों और युवाओं के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे समय में खेल केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि संस्कार, अनुशासन और स्वस्थ जीवन का सबसे सशक्त माध्यम बनकर सामने आता है।

एक खिलाड़ी और कोच के रूप में मेरा अनुभव रहा है कि जो बच्चा खेल के मैदान से जुड़ जाता है, वह स्वतः ही नशे से दूर हो जाता है। खेल बच्चों को लक्ष्य देता है, आत्मविश्वास सिखाता है और टीम भावना विकसित करता है। यही कारण है कि “स्पोर्ट को बढ़ावा – नशे से दूरी” आज केवल एक नारा नहीं, बल्कि समाज की आवश्यकता बन चुका है।

पिछले वर्ष आयोजित खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिला। इस आयोजन में देशभर से आए खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों और अतिथियों को देखकर यह स्पष्ट हुआ कि भारत सरकार खेलों को जन-आंदोलन का रूप देने की दिशा में गंभीर है। विशेष रूप से युवाओं और बच्चों को खेलों से जोड़ने के लिए इस तरह के आयोजनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यदि हम आंकड़ों की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण दुनिया भर में हर वर्ष लगभग 50 लाख से अधिक असमय मौतें होती हैं। वहीं भारत में मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, जिनका सीधा संबंध निष्क्रिय जीवनशैली से है। इसका समाधान केवल अस्पतालों में नहीं, बल्कि खेल के मैदानों में है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो फिनलैंड, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने स्कूल स्तर पर खेलों को अनिवार्य बनाकर बच्चों के स्वास्थ्य और अनुशासन में उल्लेखनीय सुधार किया है। भारत में भी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) खेलों को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा मानती है, जो एक सकारात्मक और दूरदर्शी कदम है।

मेरा मानना है कि यदि हम छोटे बच्चों को प्रारंभिक उम्र से ही खेलों से जोड़ें, तो न केवल वे शारीरिक रूप से मजबूत होंगे, बल्कि मानसिक तनाव, अवसाद और नशे जैसी प्रवृत्तियों से भी सुरक्षित रहेंगे। खेल बच्चों को हार-जीत को स्वीकारना, मेहनत करना और नियमों का सम्मान करना सिखाता है—ये गुण जीवनभर साथ रहते हैं।

बीकानेर जैसे शहरों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता है माता-पिता, शिक्षकों और समाज के संयुक्त प्रयास की, ताकि हर बच्चा मोबाइल से मैदान की ओर आए। जब खेल संस्कृति मजबूत होगी, तभी हम एक स्वस्थ, अनुशासित और नशामुक्त भारत की कल्पना को साकार कर पाएंगे।

अंत में, मैं यही संदेश देना चाहूंगी—
बच्चे को मोबाइल नहीं, मैदान दीजिए;
नशे से नहीं, खेल से जोड़िए;
बीमारी से नहीं, ऊर्जा से भरिए।

यही आज का नया, सकारात्मक और राष्ट्रनिर्माण का संदेश है।

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