साहिब साधु दयाल है, हम ही अपराधी। दादू जीव अभागिया, अविद्या साधी।। संतशिरोमणि ब्रह्मर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि भगवान और साधु दयालु ही होते हैं। संत सबका हित चाहते हैं, इसलिए दयालु है और परमात्मा अपने दयालू स्वभाव के कारण सबकी पालना करते हैं परंतु यह जीव ही अभागा है, जिसने शुभकर्म को छोड़कर अशुभ कर्म को अपनाया है। विवेक चूड़ामणि में अपनी आत्मा से कोई भी वैर भाव नहीं करता। उसी प्रकार किसी भी प्राणी के साथ वैर नहीं करना चाहिए। यही सब सिद्धांतों का सार है। वास्तविक शत्रु तो हमारे शरीर में काम, क्रोध, अशुभ कर्म आदि ही है। श्रीमद्भागवत में जिस प्रकार चंदन वृक्ष के समीप रहने वाले सभी प्रकार के वृक्ष उसके संपर्क से सुगंधित हो जाते हैं। वैसे ही साधु की संगति में सभी जातियों के प्राणी शुभ-अशुभ का निश्चय करने में महान बुद्धिमान बन जाते हैं।
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