क्षिर नीर का सन्त जन, न्याव नबेरैं आइ। दादू साधू हंस बिन, भेल सभेलै जाइ।। ब्रह्मऋषि श्रीदादूदयाल जी महाराज कहते हैं कि इस असार संसार में सार क्या है और असार क्या है, आत्मा किसको कहते और अनात्मा क्या है, इस बात को संत ही जानते हैं । जैसे कि हंस क्षिर नीर विवेचन में चतुर है।
वेदांतसंदर्भ में वेद और शास्त्रों का कोई पार नहीं क्योंकि वे अनंत है और प्राणी की आयु स्वल्प है। फिर विघ्न भी अनंत है। अतः सब का सार निकालकर, जो असार उसको त्याग दे जैसे हंस पानी में से दूध को निकाल देता है। सार क्या है, इस विषय में लिखा है कि सत्संग, भगवान की भक्ति तथा गंगा स्नान यह तीन ही इस असार संसार में सार कहलाते है। इसलिए अज्ञानी जीव को सारा संसार का ज्ञान न होने से अनात्म विषयों में ही रमण करता हुआ दुःखी होता है। अष्टावक्र गीता में मनुष्य यदि मुक्ति चाहता है तो विषयों को विष की तरह त्याग दो और क्षमा, नम्रता, दया, पवित्रता और सत्य को अमृत की तरह समझ साधारण करो।