जयपुर: प्रोफेसर देवेन्द्र कौशिक और रईसा कौशिक की स्मृति में राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति में ‘’वैश्विक कारोबार का नया रूप: ट्रम्प के टैरिफ का प्रभाव’’ जैसे ज्वलंत विषय पर देश के ख्यातनाम अर्थशास्त्रियों और विचारकों की पैनल चर्चा हुई। इसमें वक्ताओं की राय थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक गंभीर राजनेता की भांति नहीं बल्कि एक दादागिरी कारोबारी की तरह व्यवहार कर रहे हैं, जिससे भविष्य में अमेरिका को नफा होगा या नुकसान अभी नहीं कहा जा सकता। कौशिक दम्पत्ति की स्मृति में ब्रिटेन में रहने वाले अर्थशास्त्री प्रो.सुरेश देमन प्रतिवर्ष जयपुर में यह आयोजन करते हैं। पैनल चर्चा में सामाजिक उद्यमी और वरिष्ठ पत्रकार सतीश झा, आईआईटी दिल्ली के रिटायर्ड प्रोफेसर वी.बी.उपाध्याय तथा यूके प्रवासी अर्थशास्त्री प्रो.सुरेश देमन ने अपने विचार व्यक्त किए।
प्रो.सुरेश देमन ने कहा कि भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह प्रतीकात्मक इशारों से आगे बढ़कर ठोस, गणनात्मक रणनीतियों को अपनाता है या नहीं। दोहराए जा रहे शोषण के चक्र से बाहर निकलने के लिए भारत को चाहिए कि वह: व्यापार और प्रौद्योगिकी में विश्वसनीय प्रतिशोधी उपाय विकसित करे। तकनीक, खनिज और विविधीकृत निर्यात में रणनीतिक दबाव क्षमता बनाए। विश्व व्यापार संगठन जैसे बहुपक्षीय संस्थानों का प्रयोग कर जबरन लगाए गए टैरिफ को चुनौती दे।
सतीश झा का कहना था कि ट्रम्प ने नीतियों की परिभाषा बदल दी है। वे कहते हैं कि मेरे मुंह से जो निकल गया वही नीति है। उनके नेतृत्व में अमेरिका एक लॉ-लेस स्टेट बन गया है। ट्रम्प मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति है।हम अमेरिका के साथ लगभग 100 अरब डॉलर के आसपास का ही व्यापार कर रहे हैं और अगर घाटे (डिफ़िसिट) की बात करें, तो अमेरिका के साथ हमारा व्यापार घाटा कहीं न कहीं 200 अरब डॉलर से कम-ज़्यादा के आसपास है और इसमें अमेरिका का घाटा है क्योंकि अमेरिका ज़्यादा आयात करता है।
प्रो.वी.वी. उपाध्याय ने अपने विहंगम प्रस्तुतिकरण में पिछले एक साल में टैरिफ पर अमेरिकी राष्ट्रपति के बार-बार बदलते फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भविष्य ही बताएगा कि इन फैसलों से अमेरिका को लाभ हुआ या नुकसान। अवकाश प्राप्त आईएएस प्रदीप्तो घोष का कहना था कि ट्रम्प स्थापित नियमबद्ध व्यवस्था को ध्वस्त कर रहे हैं। विकासशील देश बहुत बड़े पैमाने पर आगे बढ़ चुके हैं और तथाकथित “टाइगर” अर्थव्यवस्थाएँ इतनी बढ़ चुकी हैं कि उन पर दबाव डालना भी आसान नहीं रहा। चर्चा की अध्यक्षता उम्रभर मजदूरों के मुकदमे लड़ने वाले लेखक कवि अभिभाषक प्रेमकृष्ण शर्मा ने की। चर्चा में बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले प्रबुद्धजन उपस्थित थे।