सिद्धान्त विहीन, विचारधारा को तिलांजली देती भारतीय राजनीति संक्रमण काल से गुजर रही है। सत्ता व कुर्सी ही भारतीय राजनीति की मुख्य विचारधारा हो गई है। जिस दल की बदौलत सांसद बने, मंत्री पद की शोभा भी बढ़ाई, सत्ता की खातिर तिलांजली देकर दूसरे दल में चले गये। कहने का मतलब यही हुआ कि जिस तरह गुड़ के चारों और चींटीयो का जमावड़ा हो जाता है, ठीक उसी तरह सत्ता के इर्द-गिर्द घूमना ही राजनेताओं का राज धर्म हो गया है। ऐसा ही एक नाम है कांग्रेस विचारधारा से सांसद व राजस्थान सरकार में मंत्री पद की शोभा बढ़ाने वाले महेन्द्र जीत सिंह मालवीय का, जो अपनी विधायकी का परित्याग कर भाजपा में शामिल हुए। उन्होंने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने उन्हें लोकसभा डूंगरपुर बांसवाड़ा से टिकट देकर चुनाव लडने का मौका दिया, लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पाए। अब मालवीय का भाजपा में दम घुटने लगा और कांग्रेस में घर वापसी का मन यह कहकर बनाया कि भाजपा मेरे लायक नहीं लगती है। मेरे कार्यकर्ता और क्षेत्र की जनता चाहती है कि मैं कांग्रेस में ही रहूं। ऐसा नहीं है कि मालवीय ही एकमात्र कांग्रेसी नेता हैं, जिन्होंने मलाई खाने के चक्कर में भाजपा का दामन थामा, बहुत से नेताओं ने भाजपा का दुपट्टा ओढ़ने की होड़ में देखे गये। अब यदि मालवीय प्रकरण का पोस्टमार्टम करें तो जब उन्होंने भाजपा का दामन थामा था, क्या उस समय कार्यकर्ताओं व क्षेत्र की जनता की भावनाओं को नहीं समझा या फिर भाजपा से किसी डील के तहत भाजपा में गये थे। जिस कांग्रेस पार्टी ने उनको मान सम्मान दिया, सांसद बने व राजस्थान मंत्रिमंडल की शोभा भी बढ़ाई और एक झटके में ही सत्ता की मलाई खाने के चक्कर में कांग्रेस से मोहभंग हो गया। चूंकी भारतीय राजनीति सिध्दांत विहीन हो गई है और विचारधारा निजी स्वार्थ के नीचे दफन हो गई है। यह भारतीय राजनीति का वह संक्रमण काल है, जहां नेताओं को अर्जुन की मछली की आंख की तरह कुर्सी दिखाई देती है। नेताओं ने तो अपनी वफादारी सत्ता के प्रति दिखा दी, अब प्रदेश के मतदाताओं को इस बात को लेकर गंभीरता से सोचना होगा कि ऐसे नेताओं की जगह आखिर कहां होनी चाहिए।
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