दादू जियरा जाइगा, यहु तन माटी होइ। जे उपज्या सो विनश है,अमर नहीं कलि कोइ।। संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि एक दिन यह जीव अवश्य मर जाएगा। शरीर भी मरकर मिट्टी में मिलेगा क्योंकि जो पैदा होता है, उसकी मृत्यु अवश्य होती है, ऐसा ही नियम है और इस युग में अमर तो कोई हो ही नहीं सकता है। महाभारत में जैसे पुराने या नए वस्त्रों को त्याग कर मनुष्य दूसरा वस्त्र धारण करता है। ऐसे ही देही एक देह को त्याग कर दूसरा धारण करता है। पैदा होते ही चराचर जगत को काल नाश करने लग जाता है। साथ में बुढ़ापा भी आने लगता है। सारे पदार्थ इन दोनों भाव से बंधे हुए हैं। मार्कण्डेय पुराण में इस संसार में सभी प्राणी कुछ समय के अतिथि हैं। जैसे आए हैं वैसे ही समय पर चले जाएंगे। मैं भी इसी विचार में मगन हूं कि हमें भी एक दिन चलना होता है तो उस काल की प्रतीक्षा कर रहा हूं अथवा साधना परायण होकर उस काल पर विजय प्राप्त कर लूं। अतः ईर्ष्यालु तथा कृतघ्न पुरुष परमात्मा की प्राप्ति में बाधक होने से प्रत्यक्ष काल का ही रूप है, दुष्ट का संग कभी नहीं करना चाहिए किंतु दूर से ही उसको त्यागकर परमात्मा का भजन करना चाहिए, जिससे जीव मुक्त हो जाए।
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